परिशिष्ट-3
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आर्यों और अनार्यों के बीच भिन्नता संस्कृति के आधार पर थी, जातीय आधार पर नहीं। सांस्कृतिक भेद दो बिन्दुओं पर था। आर्य चातुर्वर्ण्य में विश्वास रखते थे। अनार्य इसके विरुद्ध थे। दक्ष के यज्ञ के विषय में इन तथ्यों के संदर्भ में यह स्पष्ट है कि शिव एक अवैदिक और अनार्य देव थे। प्रश्न यह है कि वैदिक संस्कृति के स्तंभ ब्राह्मणों ने शिव को देवता कैसे मान लिया?
एक विद्वान के मस्तिष्क को उलझा देने वाला तीसरा प्रश्न वह परिवर्तन और संशोधन है जिसे ब्राह्मणों ने शिव ओर विष्णु के मौलिक स्वरूप में कर डाला।
हिंदू इससे परिचित नहीं हैं कि शिव एक अवैदिक और अनार्य देवता है। वे उन्हें वेदों में उल्लिखित रुद्र के साथ जोड़ते हैं। इसी कारण हिंदुओं का रुद्र शिव के समान है। यजुर्वेद की तैत्तिरीय संहिता में एक मंत्र है, जिसमें रुद्र की स्तुति है। इस मंत्र में रुद्र अर्थात् शिव को चोरों, दस्युओं, डकैतों के देवता के रूप में वर्णित किया गया है। उन्हें, पतितों, कुम्हारों और लोहारों का राजा बताया गया है। प्रश्न यह है कि ब्राह्मणों ने चोरों, डाकुओं के राजा को अपना परमदेव कैसे मान लिया?
रुद्र के चरित्र के संबंध में भी एक परिवर्तन हुआ जिसे ब्राह्मणों ने अपना देव शिव मानकर किया था। आश्वलायन गृह्य-सूत्र में रुद्र की उपासना की समुचित विधि बताई गई है। इसके अनुसार शिव की उपासना में बृषभ बलि दी जाती है। इस सूत्र में बलि की ऋतु और नक्षत्र का भी उल्लेख है। इसमें गृहस्थों से कहा गया है कि वे अपने बाड़े के सर्वश्रेष्ठ बृषभ का चयन करें, उसका रंग भी बताया गया है, और कहा गया है कि वह मोटा-ताजा होना चाहिए। उसे चावल के मांड और जौ के पानी से छका दिया जाना चाहिए। तब इसका वध किया जाए और रुद्र के नामों का उच्चारण कर उसे बलि चढ़ा दिया जाए। उसकी पूंछ, खाल और पैर अग्नि को सौंप दिए जाएं। स्पष्ट है कि रुद्र एक हिंसक देव था जिसके लिए जीव-बलि आवश्यक थी। प्रश्न यह है कि ब्राह्मणों ने शिव से मांसाहार क्यों छुड़वा दिया और उन्हें शाकाहारी क्यों बना दिया?
हिंदू भारत भर में बिना लज्जा और पश्चाताप के लिंग पूजा-शिश्न पूजा का महत्व स्वीकारते हैं। लिंग पूजा शिव से जुड़ी है और सामान्यतः यह कहा जाता है कि शिव की सच्ची पूजा की विधि शिव लिंग पूजा ही है। क्या लिंग पूजा का संबंध शिव से सदा था? प्रोफेसर दाण्डेकर के लेख ‘विष्णु इन द वेदाज’ में एक रोचक तथ्य दिया गया है। प्रोफेसर दाण्डेकर कहते हैंः
‘‘इस संबंध में सर्वाधिक महत्वपूर्ण शब्द ‘‘सिपिविष्त’’ हैं। इसका वेदों में विष्णु के संबंध में विशिष्ट उल्लेख है। जिस छंद में यह शब्द आया है वह है ऋ.वे.