परिशिष्ट-3: त्रिमूर्ति की पहेली - Page 177

162 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

तीनों देव सती का शील-हरण करने अत्रि की कुटिया की ओर चल पड़े। इन तीनों ने ब्राह्मण भक्षुओं का वेष धारण किया। जब वे वहां पहुंचे, अत्रि बाहर गए हुए थे। अनसूया ने उनका स्वागत किया और उनके लिए भोजन तैयार किया। जब भोजन तैयार हो गया तो उनसे आसन पर बैठकर भोजन करने के लिए कहा। तीनों देवों ने उत्तर दिया कि वे उसी स्थिति में उसके घर भोजन करेंगे, जब वह निर्वस्त्र होकर भोजन परोसे। प्राचीन भारत में आतिथ्य का नियम था कि ब्राह्मण भिक्षुक असंतुष्ट होकर न लौटे। वह जो मांगे, उसे दिया जाए। इस नियम के अनुसार अनसूया निर्वस्त्र होकर भोजन परोसने को सहमत हो गई। जब वह इस स्थिति में भोजन परोस रही थी तो अत्रि आ गए। जब उन्होंने अत्रि को आते हुए देखा तो वे नवजात शिशु बन गए। इन तीनों को अत्रि ने पालने में लिटा दिया। उसमें इन तीनों के सभी अंग जुड़कर एक हो गए परन्तु सिर अलग-अलग रहे। इस प्रकार दत्तात्रेय बने, जो तीनों देव ब्रह्मा, विष्णु और महेश का संयुक्त रूप हैं।

इस कहानी में अनैतिकता की दुर्गंध भरी पड़ी है और इसके अंत को जान-बूझकर ऐसा मोड़ दिया गया है, जिससे ब्रह्मा, विष्णु और महेश के उस वास्तविक कुकर्म पर पर्दा डाल दिया जाए। उन्होंने अपनी पत्नियों के समक्ष सती अनसूया को गिरा दिया जैसा कि कहानी में निहित है। किसी समय हिंदुओं में यह प्रचलित था कि ब्रह्मा, विष्णु और महेश की समान स्थिति है और उनके कार्य एक-दूसरे के पूरक हैं। प्रतिस्पर्धात्मक नहीं। उन्हें त्रिमूर्ति कहा जाता था- एक साथ तीनों और एक में तीन। सभी विश्व के नियंता, ब्रह्मा सृष्टा, विष्णु पालक और शिव संरक्षक हैं।

सामंजस्य की यह स्थिति अधिक दिनों नहीं चली। इन तीनों देवों के चारण ब्राह्मण तीन शिविरों में बंट गए। प्रत्येक के अनुयायी ने दूसरे के आराध्य को गिराने के लिए कमर कस ली। इसका परिणाम यह निकला कि एक देव के अनुयाई ब्राह्मणों ने दूसरे के विरुद्ध बदनामी और नीचा दिखाने का अभियान छेड़ दिया।

यह बड़ी रोचक और जानने योग्य बात है कि ब्राह्मणों ने ब्रह्मा के साथ क्या रचना रची? कोई समय था जब ब्रह्मा को सत्ता और गौरव से सर्वोच्च शिखर पर रखा जाता था। उन्होंने ब्रह्मा को जगत का प्रथम प्रजापति कहा। वह उनके साथ एकमेव परमदेव थे। ब्राह्मणों ने अवतारवाद का आविष्कार किया जिसका अर्थ है, भगवान आवश्यकता पड़ने पर मानव अथवा पशु किसी भी रूप में अवतरित हो सकता है। इसके पीछे दो उद्देश्य थे। पहला, भगवान की श्रेष्ठता बताना, जिसमें उनका स्वार्थ हो और दूसरे, देवताओं और अन्य व्यक्तियों के बीच संघर्ष को स्वीकार करना।