परिशिष्ट-3
161
वानर ने उनमें कोई औषधि प्रविष्ट की। इसके माध्यम से उनकी शक्ति फिर लौट आई। परवर्ती साहित्य में वृषकपि विष्णु को ही कहा गया है। यह शब्द विष्णु सहस्रनाम में भी सम्मिलित है।
प्रो. दाण्डेकर द्वारा प्रस्तुत प्रमाणों के अनुसार लिंग-पूजा मूल रूप में विष्णु से ही संबद्ध थी, पुराणों में लिंग-पूजा विष्णु से नहीं जुड़ी हुई है। पुराणों में इसे शिव के साथ जोड़ दिया गया। यह आश्चर्यजनक परिवर्तन है। विष्णु, जो आरंभ से ही लिंग पूजा से संबद्ध थे, उनका संबद्ध इससे तोड़ दिया गया और शिव का लिंग-पूजा से कोई लेना-देना नहीं था, वह उनके मत्थे मढ़ दी गई। प्रश्न यह है कि ब्राह्मणों का क्या इरादा था जो उन्होंने विष्णु को लिंग-पूजा से मुक्त करके शिव को इसके साथ लपेट दिया?
अब अंतिम प्रश्न यह है कि ब्रह्मा, विष्णु और महेश के परस्पर संबंधों के संदर्भ में इस से बढ़कर कोई बात नहीं हो सकती जो भगवान दत्तात्रेय के जन्म के विषय में हैं। संक्षेप में कहानी इस प्रकार है कि एक बार तीनों देवों की पत्नियां सरस्वती, लक्ष्मी और पार्वती एक स्थान पर बैठी बात कर रहीं थी, तभी नारद जी प्रकट हुए। वार्ता के बीच एक प्रश्न उठा कि संसार में सबसे बड़ी पतिव्रता नारी कौन है? नारद ने कहा कि अत्रि ऋषि की पत्नी अनसूया सबसे बड़ी सती है। तीनों देवियां इससे चमक उठीं और प्रत्येक ने अपने आपको सब से बड़ी पतिव्रता सती नारी बताया। नारद जी नहीं माने और उनमें से प्रत्येक के व्यभिचार के अनेक प्रसंग प्रस्तुत किए। वे शांत तो हो गईं परन्तु भीतर प्रतीशोध की भावना प्रबल हो उठी। वे अनसूया के मुकाबले अपनी स्थिति बताना चाहती थीं। उन्होंने सोच-विचार कर षडयंत्र रचा कि अनसूया के साथ अवैध संभोग कराकर उसका शील भंग कराया जाए। अपनी योजना के अनुसार तीनों देवियों ने अपने पतियों के शाम को घर लौटने पर दोपहर में नारद के साथ हुए संवाद का जिक्र किया और बताया कि नारदजी ने उन्हें किस प्रकार लज्जित किया है और अपनी पत्नियों के अपमान का कारण वे हैं। यदि उन्होंने अनसूया के साथ व्यभिचार किया होता तो वह भी उनकी श्रेणी में आ जाती और नारद को उनका अपमान करने का अवसर न मिलता। उन्होंने अपने पतियों से पूछा कि क्या वे अपनी पत्नियों का ख्याल रखते हैं? यदि हां तो क्या यह उनका कर्त्तव्य नहीं है कि वे अनसूया का शील भंग करने के लिए तुरन्तु प्रस्थान करें और उसे सतीत्व के उस शिखर से नीचे धकेल दें, जिस पर उसे नारद ने बैठा बताया है। देवता सहमत हो गए कि यह उनका कर्त्तव्य है और वे इससे मुंह नहीं मोड़ सकते।