164 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
इन पुराणों में ये सभी अवतार विष्णु के बताए गए हैं। परन्तु आरंभ में जब अवतारों की धारणा शुरू हुई तो दो अवतारों सूकर ख्1, और मत्स्य ख्2, को बाद में विष्णु का अवतार कहा गया है। पहले ये ब्रह्मा के माने जाते थे। जब ब्राह्मणों ने शिव और विष्णु को भी ब्रह्मा के समान पद देना स्वीकार कर लिया तो भी फिर से उन्होंने ब्रह्मा की सत्ता विष्णु और शिव से ऊपर माननी आरंभ कर दी। ब्राह्मणों ने उन्हें शिव ख्3, का जनक बताया और प्रचारित किया कि यदि विष्णु ख्4, सृष्टि के पालकर्ता हैं तो वे सभी ब्रह्मा की आज्ञा से ही यह कार्य सम्पादन कर रहे हैं। देवों की एकाधिक संख्या होने के कारण उनके बीच सदैव संघर्ष की स्थिति विद्यमान रहती थी और विवाद निपटाने के लिए किसी मध्यस्थ और निर्णायक देव की आवश्यकता थी।
पुराणों में ऐसे संघर्ष, यहां तक देवताओं के बीच युद्धों की कहानियां भी भरी पड़ी हैं। रुद्र और नारायण ख्5, के बीच तथा कृष्ण और शिव ख्6, के बीच संघर्ष हुआ। इन संघर्षों के समय ब्राह्मणों ने ब्रह्मा को मध्यस्थ बना डाला।
वही ब्रह्माण, जिन्होंने ब्रह्मा को इतना ऊंचा स्थान दिया था, उसी के पीछे पड़ गए, उन्हें नीचा दिखाने लगे, उन पर कीचड़ उछालने लगे। उन्होंने प्रचार आरम्भ किया कि ब्रह्मा सचमुच शिव और विष्णु से हीन हैं। अपनी पुरानी कथनी के विपरीत ब्राह्मणों ने कहा कि ब्रह्मा शिव से पैदा हुए थे और कुछ ने कहा वह विष्णु ख्7, से पैदा हुए थे।
ब्राह्मणों ने शिव और ब्रह्मा के परस्पर संबंधों को पलट दिया। अब ब्रह्मा के पास मोक्ष देने का अधिकार नहीं रहा। शिव ही मुक्ति दे सकते थे ब्रह्मा एक साधारण देवता बन गए जो अपने मोक्ष ख्8, के लिए शिव और शिवलिंग के उपासक हो गए। उन्होंने ब्रह्मा को शिव ख्9, का सारथि बना डाला।
ब्राह्मणों को ब्रह्मा का स्थान गिराये जाने से अभी संतोष नहीं हुआ था। उन्होंने हद दर्जे तक उनकी बदनामी की। उन्होंने एक कहानी उछाल दी कि ब्रह्मा ने अपनी पुत्री सरस्वती से बलात्कार किया। यह कथा भागवत पुराण ख्10, में दोहराई गई है ख्11, ः
रामायण-म्यूर द्वारा संस्कृत टैक्स्ट में उद्धृत, खंड 4, पृ. 33
महाभारत-वनपर्व एवं लिंग पुराण-म्यूर, वही, पृ. 38-39
विष्णु पुराण-म्यूर, वही. पृ. 392
रामायण-म्यूर, वही, पृ, 477
महाभारत शांति पर्व, म्यूर द्वारा उद्धृत खंड 4, पृ, 240
महाभारत शांति पर्व-पृ. 279
महाभारत अनुशासन पर्व, म्यूर, वही, पृ. 188
भागवत पुराण-वही, पृ. 43
महाभारत-म्यूर द्वारा संस्कृत टैक्स्ट में उद्धृत, खंड 4, पृ. 192
वही, पृ. 193
म्यूर संस्कृत टैक्स्ट, खंड 4, पृ. 47