परिशिष्ट-3
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‘‘हे क्षत्रियो! हमने सुना है कि स्वायंभुव (ब्रह्मा) के मन में अपनी अबला और मोहक पुत्री वाच के प्रति कामुकता जगी, जिसके मन में उनके प्रति कामभाव नहीं था। ऋषियों और मारीचि के नेतृत्व में मुनियों और उनके पुत्रों ने अपने पिता के कुकर्म पर उन्हें फटकारा, ‘‘तुमने ऐसा किया जो तुमसे पहले किसी ने नहीं किया, न तुम्हारे बाद कोई ऐसा करेगा।’’ विधाता होते हुए क्या तुम्हें अपनी पुत्री से विषय भोग करना चाहिए था? अपने उन्माद को क्या तुम रोक नहीं सकते थे? संसार के तुम्हारे जैसे गौरवशाली व्यक्ति के लिए यह प्रशंसनीय नहीं है। जिनके कार्यों की मर्यादा के कारण व्यक्ति का आनन्द प्राप्त होता है, जिस विष्णु की दीप्ति से यह ब्रह्मांड प्रकाशित होता है, जो उसी से फूटती लौ है, वही विष्णु धर्मपरायणता को बनाए रखे। ‘‘अपने पुत्रों के व्यवहार को देखकर, जो प्रजापतियों के स्वामी को ऐसा कह रहे थे, वे शर्म से गढ़ गए और अपने शरीर का विखंडन कर दिया। उसके भयानक अवशेष उस क्षेत्र में फैल गए और वही कोहरे के नाम से विख्यात हुआ।’’
ब्रह्मा के विरुद्ध ऐसा अपकर्ष एवं अपमानजनक आक्रमण होने से वे तिरस्कृत हो गए। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि भारत में उनकी उपासना लुप्त हो गई और वे औपचारिक रूप में ही त्रिमूर्ति में सहयोगी रह गए।
ब्रह्मा के मैदान से बाहर हो जाने पर रह गए शिव और विष्णु। ये दोनों भी कभी शांति से नहीं बैठे। दोनों के बीच प्रतिस्पर्धा, संघर्ष जारी रहा। आइए, देखें इस प्रचार-युद्ध में उन्होंने अपने विपक्षियों की क्या गत बनाई। कोई-सा भी पक्ष अपने विरोधी देव का पंथ समाप्त करने में सफल न हो सका। शिव और विष्णु की उपासना जारी रही और फलती-फूलती रही। इसके बावजूद कालांतर में अनेक पंथ अस्तित्व में आए और उनको कभी राहु ने नहीं ग्रसा। इसका प्रमुख कारण यह है कि ब्राह्मणों ने धुंआधार प्रचार और प्रतिप्रचार जारी रखा। प्रचार-तंत्र किस प्रकार चलता रहा, वह कुछ निम्न उदारहणों से जाना जा सकता है।
विष्णु वैदिक देवता सूर्य से संबद्ध है और शिवभक्त उनका संबंध अग्नि से जोड़ते हैं। इसका आशय यह प्रकट करना था कि यदि विष्णु का उद्गम वैदिक है तो शिव का उद्गम भी वैदिक है। जन्म के आधार पर कोई भी एक-दूसरे से घट कर नहीं है।
शिव विष्णु से बड़े हों और विष्णु इनसे कम न हों। विष्णु के सहस्र नाम ख्1, हैं तो शिव के भी सहस्र नाम होने चाहिए और ऐसा ही हुआ। ख्2, विष्णु के अपने प्रतीक ख्3, हैं। इसी प्रकार शिव के भी होने चाहिए और उनके अपने ख्4, प्रतीक हैं।
देखें विष्णु सहस्रनाम।
पद्म पुराण में उद्धृत।
ऊपर देखें।
वे है। (1) बहती गंगा, (2) चन्द्र, (3) शेष नाग, (4) जटा-जूट।