भाग-I धर्मिक - Page 19

4 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

‘‘यह स्पष्ट है कि जब तक संदेह नहीं उपजते, तब तक प्रगति असंभव है। हमने यह देखा है कि सभ्यता मानव के आध्यात्मिक ज्ञान के योगदान पर निर्भर रही है और इस बात पर अवलम्बित है कि इस ज्ञान को कहां तक संचारित किया गया है। परंतु लोग अपने ज्ञान से संतुष्ट होकर बैठ जाते हैं। उसमें और वृद्धि की गुंजाइश नहीं समझते। जो व्यक्ति अपने ज्ञान और विचारों को संपूर्ण मानता है, वह यह कष्ट नहीं करता कि उसके आधार को टटोले। जो कुछ उन्होंने अपने पुरखों से सीखा है, सुना है, उसके विपरीत कुछ कहा जाए तो उन्हें अजीब लगता है। प्रायः भयानक भी लगता है। जब उनकी मानसिक स्थिति यह हो तो नए सत्य को ग्रहण करना असंभव लगता है जो उनके पूर्व अर्जित निर्णयों से मेल नहीं खाता।

इस प्रकार सामाजिक प्रगति के लिए नए तत्वों की जानकारी आवश्यक होने पर भी ऐसे ज्ञान की निरख-परख की जानी चाहिए क्योंकि बिना संदेह के हम निरख-परख नहीं करेंगे और बिना इसके ज्ञान प्राप्त नहीं होगा। ज्ञान कोई धरोहर या जड़ तत्व नहीं है जो बिना उद्योग किए हमारे पास दौड़ा चला आएगा। इसके लिए उद्यम करना होगा, इसके लिए अध्यवसाय और बलिदान की आवश्यकता है। जिन्हें अंधकार का अहसास ही नहीं है, वे प्रकाश की खोज क्यों करेंगे? यदि कभी हम सुनिश्चित हों तो आगे विश्लेषण नहीं करते क्योंकि विश्लेषण व्यर्थ अथवा भयावह हो सकता है। निरख-परख से पहले संदेह का उठना जरूरी है। हम संदेह को सूत्रधार मानते हैं जो प्रगति का जनक है।

पर ब्राह्मणों ने तो संदेह की गुंजाइश ही नहीं छोड़ी क्योंकि उन्होंने बड़ी चालाकी से एक मंत्र फूंक दिया, लोगों में एक ढकोसला फैला दिया कि वेद इंसान की रचना नहीं है। यदि हिंदू आध्यात्मवाद जड़ हो गया है और हिंदू सभ्यता तथा संस्कृति एक सड़े हुए बदबूदार पोखर की तरह हो गई है तो यह ढकोसला जड़मूल से खत्म करना होगा यदि भारत ने प्रगति करनी है। वेद बेकार की रचनाएं हैं, उन्हें पवित्र या संदेह से परे बताने में कोई तुक नहीं है। ब्राह्मणों ने इन्हें पवित्र और संदेहातीत बना दिया, केवल इसलिए कि इसमें पुरुषसूक्त के नाम से एक क्षेपक जोड़ दिया गया, इससे वेदों में ब्राह्मण को भूदेव बना दिया। कोई यह पूछने का साहस नहीं करता कि जिन पुस्तकों में कबीलाई देवताओं से प्रार्थना की गई है कि वे शत्रु का नाश कर दें, उनकी सम्पत्ति लूट लें और अपने अनुयायियों में बांट दें, कैसे संदेहातीत हो गई। परंतु अब समय आ गया है कि हिंदू इस अंधे कुएं से बाहर आएं। उन सरहीनता विचारों को तिलांजलि दे दें जो ब्राह्मणों ने फैलाए हैं। इससे मुक्ति पाए बिना भारत का कोई भविष्य नहीं है। मैंने हर तरह की जोखिम जानकर यह रचना की है। मैं इसके परिणामों से नहीं डरता। मैं यदि लोगों की आंखें खोल दूंगा तो मुझे प्रसन्नता होगी।

भीमराव अम्बेडकर