परिशिष्ट-5: वेदों की निम्रन्तिता - Page 194

परिशिष्ट-5

179

नित्यप्रति ऋग्वेद के मंत्र पढ़ता है, वह देवताओं को मधु से संतुष्ट करता है और वे प्रसन्न होकर उसके सभी मनोरथ पूर्ण करते हैं। 7. और जो यह जानकर नित्य साम मंत्र पढ़ता है, वह देवताओं को घी से संतुष्ट करता है और वे संतुष्ट होकर (यथोपरि) 8. जो यह जानकर नित्य यजुस मंत्र पढ़ता है, वह देवताओं को अमृत से संतुष्ट करता है और (यथोपरि) 9. जो यह जानकर नित्य वाकोवाक्य प्राचीन कथाओं का अध्ययन करता है, वह देवताओं को दूध और मांस की आहुतियों से संतुष्ट करता है और वे (यथोपरि) 10. पानी बहता है, सूर्य और चन्द्रमा घूमते हैं, नक्षत्र घूमते हैं। यदि किसी दिन ब्राह्मण वेदाध्ययन नहीं करता, वह दिन उसके लिए ऐसा ही है जैसे घूमने वाले वे तत्व स्थिर हो जाएं। इसलिए यह अध्ययन आवश्यक है। कोई व्यक्ति जब ऋग्वेद, सामवेद अथवा यजुस की आहुति दे रहा हो अथवा किसी गाथा या काव्य का पाठ कर रहा हो तो इस बीच उसे टोका न जाए।य्

मनु जो शतपथ ब्राह्मण की पुष्टि करते हैं, कहते हैंः

वेद पितरों की देवताओं की और पुरुषों की दिव्य आंखें हैं, ये मानव की शक्ति और समझ के बाहर हैं यह निष्कर्ष है, जो परम्पराएं वेद विहीन हैं और सभी विधर्मी मत परलोक में वृथा हैं क्योंकि उनका आधार ही अंधकार है। वेदों की परिधि के अतिरिक्त अन्य ग्रंथ उभरते हैं और नष्ट हो जाते हैं। सभी निर्मूल्य हैं और झूठे हैं। चार वर्ण, तीन लोक, चार आश्रम जैसे थे, वैसे हैं और आगे वैसे ही रहेंगे। ये वेद वर्णित हैं। जिन पदार्थों में स्पर्श, स्वाद, ध्वनि, रूप और गंध है, इन सबका ज्ञान वेदों में है। उनकी उत्पत्ति गुण, लक्षण और कर्म भी हैं। शाश्वत वेद चराचर के रक्षक हैं। इसलिए मेरे विचार में वह इस जगत, मानव सेवा के निर्देश, राजसी अधिकार, न्याय प्रक्रिया, और विश्व-सत्ता का मुख्य तत्व हैं, बस वही सुपात्र है जो वेदों को जानता है। जैसे शक्ति पाकर अग्नि हरे वृक्षों तक को जला देती है इसी प्रकार वेद-ज्ञाता अपनी आत्मा के दोषों को पचा लेता है, जो उसके कार्यों से जन्मे हों। जो वेदों का मूल तत्व जानता है, वह जीवन के किसी भी मोड़ पर क्यों न हो, बह्मलीन होने को अग्रसर है, इहलोक में भी उसके लिए यह संभव है।

फिर भी, मनु को संतोष नहीं है। वह और आगे बढ़ जाते हैं और नए सिद्धांत का प्रतिपादन करते हैं -

श्रुति का अर्थ है - वेद, स्मृति का अर्थ है - विधान, उनके विषय को किसी तर्क से चुनौती नहीं दी जा सकती क्योंकि इनसे कर्त्तव्य-बोध होता है। जो बाह्मण बौद्धक लेखों पर विश्वास रखते हैं, वे ज्ञान के इन दो प्राथमिक स्रोतों की अवमानना करते हैं। ख्1, गुणीजन उन्हें वेदों के प्रति संशयवादी और विद्रोही जानकर उनका बहिष्कार कर दें।.... 13. जो कर्त्तव्य ज्ञान चाहते हैं, उसके लिए श्रुति सर्वश्रेष्ठ स्रोत है।य्

  1. इसे 12, 106 के साथ पढ़ा जाना चाहिए जिसमें लिखा गया है आर्शाम धर्मोपदेशम च वेदशास्त्र विरोधिना

यस तर्केनानुसंधाते सा धर्मेन वेद नापरह। वही केवल वही कर्त्तव्य बोध से परिचित हैं जो ऋषियों का

अनुगमन करते हैं, तर्क द्वारा जो वेद विरुद्ध नहीं हैं।