178 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
की आहुति से प्रसन्न करता है और वे संतुष्ट होकर, उसे संतुष्ट करते हैं (पूर्वोक्त की भांति)। 6. सामवेद के मंत्र देवताओं को सोम का तर्पण हैं। जो यह जानता है, वह प्रतिदिन उनका पाठ करता है। देवताओं को साम का तर्पण करता है और वे संतुष्ट होकर आदि (पूर्वाक्तानुसार) 7. अथर्वन और आंगिरस (अथर्वांगिरस) ख्1, के मंत्र देवताओं को वसा का अर्पण करते हैं। जो इसे जानता है, वह इनका नित पाठ करता है और देवताओं को वसा से संतुष्ट करता है और वे आदि (पूर्वोक्तानुसार) 8. निर्दिष्ट और वैज्ञानिक लेख, संवाद परम्पराएं, कथाएं, मंत्र और आरती देवताओं को शहद की आहुतियां हैं। जो इसे जानता है और नित्य इनका पाठ करता है, वह देवताओं को शहद की आहुति देता है और वे आदि (पूर्वोक्तानुसार) 9. इन वैदिक आहुतियों के लिए चार वषट्कार हैं, जब हवा चले, बिजली चमके, बादल गरजें, वृक्षादि गिरें तो जो व्यक्ति जानता है, यह इन्हें क्रम से पढ़ें। यह पाठ अनवरत रहना चाहिए। ख्2, जो ऐसा करता है, वह एक ही बार मृत्यु को प्राप्त होता है और ब्रह्म में लीन हो जाता है। यदि वह तीव्रता से न भी पढ़ पाए, उसे देवताओं से संबद्ध अंश का पाठ करना चाहिए। इस प्रकार वह अपने जीवित प्राणियों से वंचित नहीं होगा।य्
5, 7, 1ः फ्अब वैदिक साहित्य के अध्ययन का गुणगान आता है। जो अध्ययन-अध्यापन प्रिय है, ऐसा कार्य करने वाला व्यक्ति धैर्यवान होता है, किसी के अधीन नहीं होता। वह सफल मनोरथ होता है। उसे सुखद निद्रा आती है, वह अपना वैद्य स्वयं है। अपने मन पर नियंत्रण रखता है, उसका चित्त स्थिर रहता है, यश और बुद्धि बढ़ती है, मानवजाति को शिक्षित करने की क्षमता रखता है। इस प्रकार शिक्षित पुरुष ब्राह्मण है। वह चार अधिकारों का पात्र है। आदर, दक्षिणा, दमन मुक्ति और वध के भय से मुक्ति। 2. दोनों लोकों में जो श्रेष्ठ जाने जाते हैं, उसमें वेदों का अध्ययन सर्वोच्च है, जो इसको जान कर अध्ययन करता है। इस प्रकार इनका अध्ययन करते रहना चाहिए। 3. जब कोई व्यक्ति वैदिक मंत्रों का अध्ययन करता है, वह सम्पूर्ण यज्ञ करता है अर्थात् जो भी उसे जाने वैसे अध्ययन करे आदि आदि। 4. और ऐसा व्यक्ति भी जो उबटन से सुगंधित हो, रत्नाभूषित हो, भोजन में तृप्त हो और सुख शैल पर आसीन हो, वेदों का अध्ययन करता है तो वह सर्वांग तप करता है, ख्3, यह जानते हुए अध्ययन करता है उसे आदि। 5. ऋग्वेद की ऋचाएं मधु हैं, सामवेद की घी, यजुस की अमृत, जब कोई वाको-वाक्य पढ़ता है या पौराणिक आख्यान पढ़ता है तो वे दोनों उबले दूध और पके मांस की आहुतियों के समान हैं। 6. जो यह जानकर
अथर्व संहिता इस तरह कही जाती है।
देखें बोटलिंग्क और रोया वे शब्द कोश, एस.वी. छाम्बर।
प्रो. वेबर ने यह वाक्य दूसरी प्रकार से लिखा है, इण्ड स्टड 10, पृ. 112, जैसे_ वह (पवित्र अग्नि से)
सर्वांग जलाता है। इसी संबंध में आगे कहा गया है कि नक मौदगल्य ने तैत्तिरीय आरण्यक में कहा है,
स्वाध्याय प्रवचने इव तद् ही तपः। आरण्यक 7, 8 में कहा गया है कि अध्ययन और अध्यापन साथ
चलना चाहिए जैसे आध्यात्मिक कर्मकांड यथा सत्यम तप, दम, साम, अग्निहोत्र, यज्ञ आदि, देखें इण्डि
स्टड 2.214 और 10, 113.