सोलहवीं पहेली: चातुर्वर्ण्य - क्या ब्राह्मण अपनी उत्पत्ति से परिचित हैं? - Page 197

सोलहवीं पहेली

चातुर्वर्ण्ये-क्या ब्राह्मण अपनी उत्पत्ति से

परिचित हैं?

प्रत्येक हिंदू का यह मूल विश्वास है कि हिंदुओं की सामाजिक व्यवस्था दैवीय है। इस दैवीय व्यवस्था के तीन आधार हैं। प्रथम, समाज चार वर्णों में विभक्त है-

  1. ब्राह्मण, 2. क्षत्रिय, 3. वैश्य और 4. शूद्र। द्वितीय, चारों वर्णों की स्थिति एक-दूसरे से जुड़ी है। उसमें चरण-दर-चरण असमानता है। ब्राह्मणों का स्थान सर्वोपरि है। क्षत्रिय ब्राह्मणों के नीचे हैं, परन्तु वैश्यों और शूद्रों से ऊपर हैं। वैश्य ब्राह्मणों और क्षत्रियों से नीचे हैं, परन्तु शूद्रों से ऊपर हैं। शूद्र सबसे नीचे हैं। तृतीय, चारों वर्णों का व्यवसाय निश्चित है। ब्राह्मणों का व्यवसाय अध्ययन-अध्यापन है, क्षत्रियों का कार्य लड़ना है। वैश्यों का कार्य व्यापार है और शूद्रों का शारीरिक श्रम से तीनों वर्णों की सेवा करना है। यह हिन्दुओं की वर्ण-व्यवस्था कहलाती है। यह हिंदूधर्म की आत्मा है। वर्ण-व्यवस्था को छोड़कर हिन्दुओं में ऐसा कुछ नहीं है, जिसमें वे अन्य धर्मों से भिन्न हों। इस कारण यह आवश्यक है कि इस बात का विवेचन किया जाए कि वर्ण-व्यवस्था का प्रचलन कैसे हुआ?

इसकी उत्पत्ति की व्याख्या के लिए हमें हिन्दुओं के प्राचीन शास्त्रों का मंथन करना होगा कि वे इस विषय में क्या कहते हैं?

I

यह अच्छा होगा कि सर्वप्रथम वेदों के विचारों को देखा जाए। इस विषय पर ऋग्वेद के दसवें मण्डल के नब्बेवें श्लोक में इस प्रकार कहा गया हैः

  1. फ्पुरुष के एक सहस्त्र शीश हैं, एक सहस्त्र चक्षु, एक सहस्त्र चरण। वह पृथ्वी पर सर्वत्र परिपूर्ण व्यापक है। उसने दस अंगुलियों से हर छोर से समस्त भूमंडल को आच्छादित कर रखा है।य् 2. फ्पुरुष स्वयं सम्पूर्ण (ब्रह्मांड) है जो वर्तमान है। (जो

यह 33 पृष्ठों का टंकित आलेख है। संशोधन लेखक ने स्वयं किए हैं। सभी पृष्ठ अलग-अलग थे और टैग से बंधे थे। शीर्ष पृष्ठ लेखक ने हाथ से लिखा है। - संपादक