184 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
कृष्ण यजुर्वेद की मैत्रायणी और कठ संहिताओं में ऋग्वेद के पुरुष सूक्त का कोई संदर्भ नहीं है, न उसमें वर्ण-व्यवस्था की उत्पत्ति का मूल बताने का कोई प्रयास है।
कृष्ण यजुर्वेद की तैत्तिरीय संहिता और श्वेत यजुर्वेद की वाजसनेयी संहिता में वर्ण-व्यवस्था के संबंध में कुछ संकेत हैं।
वाजसनेयी संहिता में वर्ण-व्यवस्था के आरंभ के संबंध में केवल एक प्रसंग है। दूसरी ओर तैत्तिरीय संहिता में दो प्रसंग हैं। इन दोनों प्रसंगों के संदर्भ में दो बातें उल्लेखनीय हैं। प्रथम यह कि इन दोनों में रंच-मात्र भी साम्य नहीं है। वे नितांत भिन्न हैं। दूसरे यह कि एक में तो श्वेत यजुर्वेद की वाजसनेयी संहिता से पूर्णतः साम्यता है। तैत्तिरीय संहिता का मूल पाठ निम्न प्रकार से है जिसे स्वतंत्र व्याख्या कहा जा सकता है-
फ्वह (वृत्य) भावावेश से भर उठा तब राजन्य प्रकट हुआ।य्
फ्जिसके घर यह जाने वाला वृत्य अतिथि रूप में आता है, उसे वह (राजा) स्वयं से श्रेष्ठ जानकर उसका सम्मान करें। ऐसा करके वह राजपद अथवा अपनी सत्ता पर आघात नहीं करता। उससे ब्राह्मण प्रकट हुआ और क्षत्रिय। उन्होंने कहा फ्हम किस में प्रवेश करें आदिय्
वाजसनेयी संहिता में सम्मिलित व्याख्या जो तैत्तिरीय संहिता ख्1, से साम्य रखती हैं, इस प्रकार हैं-
फ्उसने एक के साथ स्तुति की। प्राणी बने, प्रजापति राजा थे। उन्होंने तीन के साथ स्तुति की, ब्राह्मण की रचना हुई। ब्राह्मणस्पति शासक थे। उन्होंने पांच के साथ स्तुति की, विद्यमान पदार्थ उत्पन्न हुए। ब्राह्मणस्पति शासक थे। उन्होंने सात के साथ स्तुति की, सात ऋषिगण उत्पन्न हुए। धातृ शासक थे। उन्होंने नौ के साथ स्तुति की, पितृ उत्पन्न हुए। अदिति स्वामी थे। उन्होंने ग्यारह के साथ स्तुति की, ऋतुएं उत्पन्न हुइंर्। आर्तव स्वामी थे। उन्होंने तेरह के साथ स्तुति की, मास उत्पन्न हुए। वर्ष राजा था। उन्होंने पन्द्रह के साथ स्तुति की, क्षत्रिय उत्पन्न हुआ। इन्द्र राजा थे। उन्होंने सत्रह के साथ स्तुति की, पशु उत्पन्न हुए। बृहस्पति राजा थे। उन्होंने उन्नीस के साथ स्तुति की, शूद्र और आर्य (वैश्य) उत्पन्न हुए। दिवस और रात्रि शासक थे। उन्होंने इक्कीस के साथ स्तुति की, अविभाजित खुरधारी पशु उत्पन्न हुए। वरुण राजा थे। उन्होंने तेईस के साथ स्तुति की, लघु पशु उत्पन्न हुए। पुशान राजा थे। उन्होंने पच्चीस के साथ स्तुति की, वन्य-जीव उत्पन्न हुए। वायु राजा थे। (ऋ.वे.10.90,8) उन्होंने सत्ताईस के साथ स्तुति की, धरती और स्वर्ग विलग हुए। वसु, रुद्र और आदित्य
- खण्ड, 4. प्रपाठक, 3. श्लोक 10