186 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
फ्यज्ञ मनु हैं, हमारे पालक पिताय्
फ्देवों, तुमने हमें उत्पन्न किया, पोषित किया और हमारे प्रति अनुग्रह किया_ हमें पिता मनु के मार्ग से विचलित न करो।य्
फ्वह (अग्नि) जो मनु की संतति के बीच देवताओं के उद्बोधक स्वरूप निवास करता है, वह इनका भी स्वामी है।य्
फ्अग्नि, देवताओं सहित और मनु की संतान सहित मंत्रोच्चार से विविध यज्ञ कर रहे हैं, आदि फ्तुम देवों, वज और ऋभुगण जैसे देवों को प्रसन्न करते हो। मानुष की संतति के बीच शुभ दिन देवताओं के मार्ग से हमारे यज्ञ में आओ।य्
फ्मनुष-जन ने यज्ञ में अग्नि उद्बोधक की स्तुति की।य्
फ्मनुष्यों के स्वामी अग्नि ने जब भी कृतज्ञ मानुष-जन के आवास को प्रदीप्त किया, उसने राक्षस जन को मार भगाया।य्
इस संदर्भ में स्थिति के निरूपण के लिए एक क्षण रुक कर विचार करते हुए यह बात बिल्कुल स्पष्ट होती है कि चार वर्णों की उत्पत्ति के विषय में वेदों में कोई सर्वसम्मति नहीं है। किसी अन्य वेद ने ऋग्वेद की पुष्टि नहीं की है कि ब्राह्मण प्रजापति के मुख से उत्पन्न हुए, क्षत्रिय भुजाओं से, वैश्य जंघाओं से और शूद्र पैरों से।
II
अब हम ब्राह्मण साहित्य पर आएं और देखें कि इस प्रश्न पर वे क्या कहते हैं?
शतपथ ब्राह्मण की व्याख्या इस प्रकार हैः ख्1,
फ्प्रजापति नेय् ‘‘भूय् जपते हुए यह पृथ्वी बनाई, फ्भुवःय् के साथ वायु बनाई, फ्स्वाहाय् के साथ आकाश बनाया। ब्रह्मांड का इस संसार से सह-अस्तित्व है। अग्नि सर्वत्र व्याप्त है। फ्भ्ूय् कहकर प्रजापति ने ब्राह्मण उत्पन्न किया, फ्भुवःय् से क्षत्रिय, फ्स्वाहाय् से विस बनाया। अग्नि सर्वत्र व्याप्त है। भू कहकर प्रजापति ने स्वयं को उत्पन्न किया, भुवः कहकर संतति रची। फ्स्वाहाय् से पशु उत्पन्न हुए। यह विश्व स्व, संतति और पशु है, अग्नि सर्वत्र व्याप्त है।य्
शतपथ ब्राह्मण की एक अन्य व्याख्या ख्2, है। यह निम्नांकित हैः
फ्भाष्यकार के अनुसार यहां ब्रह्मा अग्नि रूप में विद्यमान थे। जिसमें ब्राह्मण वर्ण का रूप है। पहले यह एक मात्र (ब्रह्मांड) थे। एक रहते उनकी वृद्धि नहीं हुई। उन्होंने शक्ति से एक श्रेष्ठ क्षात्र (क्षेत्र) उत्पन्न किया अर्थात् देवताओं में वे जिनमें
म्यूर, संस्कृत टैक्स्ट, खण्ड 1, पृष्ठ 17
म्यूर, संस्कृत टैक्स्ट, खण्ड 1, पृष्ठ 20