सोलहवीं पहेली: चातुर्वर्ण्य - क्या ब्राह्मण अपनी उत्पत्ति से परिचित हैं? - Page 202

सोलहवीं पहेली

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शक्ति है (क्षत्राणि), इन्द्र, वरुण, सोम, रुद्र, परजन्य, यम, मृत्यु, ईशान। इस प्रकार क्षात्र से श्रेष्ठ कोई नहीं। इसलिए ब्राह्मण राजसूय यज्ञ में क्षत्रिय से नीचे बैठते हैं। वह क्षत्रिय की गरिमा स्वीकार करता है। ब्रह्मा, क्षत्रिय का उदगम है। इस प्रकार, यद्यपि राजा की श्रेष्ठता है अंत में वह उद्गम हेतु ब्राह्मण के आश्रय में जाता है। वह अति दयनीय बन जाता है। उसी के समान जिसकी श्रेष्ठता आहत होती है। 24. उसका विस्तार नहीं हुआ। उसने विस् उत्पन्न किया। देवताओं की इस श्रेणी में वसु, रुद्र, आदित्य, विश्वदेव, मारुत आते हैं। 25. उसकी वृद्धि नहीं हुई। उसने शूद्र-वर्ण पूशान उत्पन्न किया। यह पृथ्वी पूशान है। सो वह सभी का पोषण करती है। 26. उसकी वृद्धि नहीं हुई, उसने शक्ति से एक विलक्षण रूप उत्पन्न किया। न्याय (धर्म) यह शासक है (क्षात्र) अर्थात् न्याय। इस प्रकार न्याय से श्रेष्ठ कुछ नहीं। इसलिए निर्बल बलवान से त्राण को न्याय मांगता है, जैसे एक राजा से। यह न्याय सत्य है। परिणामस्वरूप ऐसे व्यक्ति के विषय में, वे कहते हैं- फ्यह सत्य बोलता है, क्योंकि उसमें दोनों गुण हैं।य् 27. यह ब्रह्म, क्षात्र, विस् और शूद्र हैं। अग्नि के माध्यम से देवताओं में वह ब्रह्मा बन जाता है, मनुष्यों में ब्राह्मण। (दैवी), क्षत्रिय के माध्यम से (मनुष्य) एक क्षत्रिय, (दैवी) वैश्य से एक (मनुष्य) वैश्य, (दैवी), शूद्र के माध्यम से एक (मनुष्य) शूद्र बनता है। अब वह देवों में अग्नि और मनुष्यों में ब्राह्मण है, और वे वास के इच्छुक हैं।य्

तैत्तिरीय ब्राह्मण में तीन व्याख्याएं हैं। प्रथम इस प्रकार हैः ख्1,

यह समस्त (ब्रह्मांड) ब्रह्मा द्वारा रचित है। मनुष्य कहते हैं कि वैश्य ऋक, ऋचाओं से बना है। वे कहते हैं यजुर्वेद के गर्भ से क्षत्रिय उत्पन्न हुआ है। सामवेद से ब्राह्मण प्रकट हुआ। यह शब्द प्राचीन है, घोषित प्राचीन।

दूसरी कहती हैः ख्2,

फ्ब्राह्मण, वर्ण देवों से प्रकट हुआ, शूद्र असुरों सेय्

तीसरी इस प्रकार हैः ख्3,

फ्वह शुष्क भोजन से स्वेच्छा से दुग्ध की आहुति दे। शूद्र दुग्ध की आहुति न दें क्योंकि शूद्र शून्य से जन्मा है। वे कहते हैं कि जब शूद्र दूध चढ़ाता है, वह आहुति नहीं है। शूद्र अग्निहोत्र में दूध से आहुति न दे क्योंकि वे इसे शुद्ध नहीं करते। जब उसे छान लिया जाये, तब वह आहुति है।य्

अब ब्राह्मणों के साक्ष्य को देखें_ वे पुरुष सूक्त का कहां तक अनुमोदन करते हैं? उनमें से कोई नहीं करता।

  1. म्यूर, संस्कृत टैक्स्ट, खण्ड 1, पृष्ठ 17

  2. वही, पृ. 21

  3. वही, पृ. 21