194 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
दूसरे आख्यान के अनुसार उनकी उत्पत्ति विष्णु से हुई जो ब्रह्मा से प्रकट हुए थे और प्रजापति दक्ष बन गए। यह इस प्रकार हैः ख्1,
फ्जनमेजय ख्2, कहता हैः फ्हे ब्राह्मण, मैंने ब्रह्मयुग (वर्णन) सुना है जो आदि युग था। मेरी भी कामना है क्षत्रिय युग के विषय में सारगर्भित और विस्तार से अनेक प्रेक्षणों के आधार यज्ञ के सोदाहरण उल्लेख का सम्पूर्ण विवरण दें। वैशंपायन ने उत्तर दिया, फ्मैं उस युग के विषय में बताता हूँ जिसका यज्ञों के कारण आदर है और जो मुक्ति में अनेक कर्मों की विशिष्टता से सम्पन्न है, जिसका आदर तब के मनुष्यों के कारण किया जाता है। मुक्ति के लिए अबाध धर्म किए जाते थे। ब्रह्म के प्रति चित्त की एकाग्रता थी और संयम था। ब्राह्मणों के उद्देश्य महानतम थे। ब्राह्मण अपने व्यवहार से गौरवान्वित और मर्यादित थे। संयम का जीवन व्यतीत करते थे। बाह्मणों के अनुसार अनुशासन था, वे अपने कर्त्तव्यपालन में त्रुटिहीन थे। उनका ज्ञान अथाह था। वे मननशील थे। तब सहस्रों युग व्यतीत होने पर ब्राह्मणों की सत्ता शिखर पर थी। तब ये मुनि इस विश्व के विलयन में सम्मिलित हुए। ब्रह्मा से विष्णु प्रकट हुए। इन्द्रिय ज्ञान से परे हो गए और ध्यानस्थ्ति हो गए। दक्ष प्रजापति बन गए और अनेक प्राणियों की सृष्टि की। ब्राह्मण को रूपराशि (चन्द्रमा को प्रिय) और अक्षय बनाया गया। क्षत्रियों को नश्वर तत्वों से रचा। एकांतरण से वैश्य बने और धूम्र परिष्करण से शूद्रों को बनाया गया। जब विष्णु वर्णों पर विचार कर रहे थे तो ब्राह्मण को गौर, लाल, पीत तथा नीले रंग से बनाया गया। इस प्रकार विश्व में मानव वर्णों में विभाजित हो गये। उनकी चार पहचान हुई, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र। एक स्वरूप अनेक कार्य। दो पैरों पर चलने वाला अत्यंत आश्चर्यजनक शक्तिमान और अपने व्यवसाय में पारंगत। तीन उच्च वर्णों के संस्कारों का वेदों में निध ार्रण हुआ। प्राणियों की योगावस्था से ब्रह्मा प्रकट हुए। विष्णु जैसी उसी ध्यानावस्था से-भगवान प्रचेतस (दक्ष) अर्थात् महान योगी विष्णु अपनी मेधा एवं ऊर्जा से ध्यानावस्था से कर्मक्षेत्र में उतरे। उन्मूलन से शूद्र उपजे_ वे संस्कार रहित हैं इस कारण वे शुद्धि संस्कारों में सम्मिलित नहीं हो सकते, न पवित्र विज्ञान से उनका संबंध है, वैसे ही जैसे ईंधन के घर्षण से अग्नि उत्पन्न होती है और लुप्त हो जाती है। उसकी यज्ञ में कोई आवश्यकता नहीं। इसी प्रकार धरती पर घूमने वाले शूद्र हैं। कुल मिला कर (बलि देने के अतिरिक्त किसी उपयोग के नहीं)। अपने जन्म के कारण, उनका जीवन शुद्धता से वंचित रखा गया है और उनकी अनावश्यकता वेदों में नियत है।य्
भागवत पुराण ख्3, में भी वर्णों की उत्पत्ति की व्याख्या है। इसका कथन हैः
फ्कई सहस्र वर्षों के उपरांत अपने कर्मों और प्रकृतिक गुणों से विद्यमान आत्मा
म्यूर, संस्कृत टैक्स्ट, खंड 1, पृ. 152-53
हरिवंश पुराण जनमेजय और वैशंपायन के बीच संवाद है।
म्यूर, संस्कृत टैक्स्ट, खंड 1, पृ. 156