अठारहवीं पहेली
- मैत्रा विजन्मा वैश्य
- रजक विदेह ब्राह्मण
- रथकार माहिष्य करण
- रेणुक नापित ब्राह्मण
- लोहकार माहिष्य ब्राह्मणी
- वर्धकी माहिष्य ब्राह्मण
- वार्य सुधन्वा वैश्य
- विजन्मा भरुष वैश्य
- शिल्प माहिष्य करण
- श्वपच चाण्डाल ब्राह्मणी
- सनक मागध क्षत्रिय
- समुद्र तक्षवृति वैश्य
- सात्वत विजन्मा वैश्य
- सुनिषाद निषाद वैश्य
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मनु द्वारा रचित पांच जातियों की श्रेणियों में से चार को तो सरलता से समझा जा सकता है। परन्तु इनमें से पांचवी श्रेणी संकर जाति के विषय में भी ऐसे ही नहीं कहा जा सकता। मस्तिष्क में अनेक प्रश्न उठते हैं। पहली बात तो यह है कि मनु की यह सूची यंत्रवत् है। यह एक सम्पूर्ण सूची नहीं है, जिसमें संकर जातियों की सभी संभावनाएं हों।
अनुलोम और प्रतिलोम विवाहों से आर्य जातियों से उत्पन्न मिश्रित जातियों के विषय में चर्चा आती है तो मनु द्वारा जातियों के नाम स्पष्ट किए जाने चाहिए थे। चार में से प्रत्येक वर्ण के बारह अनुलोम-प्रतिलोम जातियां जन्मी। यदि उन्होंने ऐसा किया होता तो अड़तालिस जातियां बननी चाहिए थीं। दरअसल उन्होंने मिश्रित विवाहों से जनित केवल चार जातियों का उल्लेख किया है।
अनुलोम और प्रतिलोम विवाहों के कारण जन्मी 144 जातियों की सूची मनु को प्रस्तुत करनी चाहिए थी, क्योंकि इन विवाहों की संख्या बारह है। वास्तव में मनु ने केवल ग्यारह जातियां बताई हैं। इन ग्यारह जातियों के निर्माण के विषय में उन्होंने केवल पांच के मिश्रण का उल्लेख किया है। इनमें से एक (वैदेह) अनुलोम प्रतिलोम