212 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
की सूची से बाहर है। आठ का प्रसंग छोड़ ही दिया गया है।
आर्य और अनार्य जातियों के मेल से उत्पन्न संकर जातियों के विषय में भी उनके कथन में विसंगति है। हमें सर्वप्रथम तो आर्यों के प्रत्येक वर्ण के अनार्यों से मिश्रण में उत्पन्न जातियों की सूची प्राप्त होनी चाहिए थी। यह अप्राप्य है। हम यह मान लेते हैं कि एक ही अनार्य जाति दस्तु थी। फिर भी हमें प्रत्येक अनुलोम प्रतिलोम के प्रतिफल में 12 जातियों का ज्ञान होना चाहिए। वास्तव में मनु ने केवल एक-मिश्रण का उल्लेख किया है।
संकर जातियों पर विचार करते समय मनु ने व्रात्य और आर्य जातियों के मिश्रण पर ध्यान नहीं दिया। व्रात्य और अनुलोम-प्रतिलोम का भी कोई उल्लेख नहीं है और न व्रात्य और अनार्य जातियों के संयोग का।
मनु की इन त्रुटियों में कुछ तो ज्वलंत और महत्वपूर्ण हैं। ब्राह्मण और क्षत्रियों से उत्पन्न संकर जाति को लेते हैं। मनु इस संबंध में मौन हैं कि इनमें कौन सी जाति बनी। न ही उन्होंने यह स्पष्ट किया है कि वे विवाह अनुलोम थे अथवा प्रतिलोम। मनु ने यह उल्लेख नहीं किया। क्या ऐसा मान लें कि उनके समय ऐसी संकर जातियां उत्पन्न ही न हुई हों? या वे ऐसा उल्लेख करने से भय खाते थे? यदि वह बात थी तो डर किस का था?
मनु तथा अन्य स्मृतिकारों ने संकर जातियों के जो नाम गिनाए हैं, उनमें से कुछ जाली लगते हैं क्योंकि जिन जातियों को जारज उत्पत्ति का बताया गया है, मनु से पूर्व उनका नाम किसी ने नहीं सुना था और न यह पता चलता है कि तब से आज तक वे कहां विलीन हैं। आज उनका कोई पता नहीं है और कभी उनका उल्लेख नहीं मिलता। जाति एक अमिट परंपरा है और एक बार बन जाने पर उसका अलग अस्तित्व जारी रहता है जब तक कि उसे लुप्त हो जाने का कोई विशेष कारण न हो। ऐसा हो तो सकता है किन्तु नाममात्र को।
ये आयोगव, धिगवान, उग्र, पुक्कस, श्वपाक, श्वपच, पांडुश्वपाक, अहिंदक, बंदिका मट्टा, महिकार, शालिका, शंडिका, शुलिका, यकज, कुकुंद कौन हैं? यह तो थोड़े से ही गिनाए गए हैं। ये कहां गए? इनका क्या हुआ?
अब हम मनु की अन्य स्मृतिकारों से तुलना करें। उन्होंने किन जातियों का उल्लेख किया है। क्या वे इन संकर जातियों की उत्पत्ति के विषय में एकमत हैं? ऐसा नहीं है। यह निम्नांकित तालिका से स्पष्ट है-