परिशिष्ट-I: वर्णाश्रम धर्म की पहेली - Page 257

242 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

वेदों में यह बताने की चेष्टा की गई है कि वर्ण पुरुष से, मनु से, प्रजापति से, वृत्य से और सोम से उत्पन्न हुए हैं।

ब्राह्मण ग्रंथों में वेदों के साथ पर्याप्त मतभेद हैं। वे पुरुष, मनु, वृत्य अथवा सोम से इसकी उत्पत्ति नहीं मानते। वे प्रजापति और ब्रह्मा के बीच अटक जाते हैं। यह नई बात है। तैत्तिरीय ब्राह्मण का अनूठा ही सिद्धांत है। उसका कहना है कि ब्राह्मण देवताओं से उत्पन्न हुए और शूद्र असुरों से।

मनुस्मृति की दो व्याख्याएं हैं, पौराणिक और बौद्धिक। पौराणिक व्याख्या के अनुसार इसका उद्गम ब्रह्मा से है और बौद्धिक व्याख्या का निष्कर्ष है कि यह व्यक्तियों का संगठनात्मक परिणाम है। रामायण, महाभारत और पुराणों का मत यह लगता है कि वर्णों का उद्भव मनु से हुआ है। मनु संबंधी सिद्धांत के प्रसंग में उन्होंने इसे पूर्णतः भ्रामक बना डाला है। रामायण में ‘मनु’ एक स्त्री है जो दक्ष की पुत्री कश्यप की पत्नी हैं। महाभारत में ‘मनु’ पुरुष है, स्त्री नहीं। वह वैवस्वत का पुत्र है, जो कश्यप के पुत्र हैं। महाभारत के कश्यप की पत्नी मनु नहीं है, दक्षयानी है जो दक्ष की पुत्री बताई गई है। पुराण वर्ण-व्यवस्था के उदय पर मनु सम्बंधी सिद्धांत को तो स्वीकार करते हैं, किन्तु भिन्न-भिन्न मत प्रकट करते हैं। विष्णु पुराण इसका जन्मदाता उसके पुत्रों को मानता है। किन्तु उसमें इतनी जल्दबाजी है कि वह मात्र दो वर्णों की व्याख्या ही भूल जाता है। यही विष्णु पुराण एक अन्य स्थान पर भिन्न सिद्धांत प्रतिपादित करता है कि चारों वर्ण मनु की पुत्री इला की प्रणाली है। दूसरे सिद्धांत के अनुसार इला का विवाह पुरुरवा से हुआ जिसके छह पुत्र थे। ज्येष्ठतम था अयुष। अयुष के क्षेत्रवृद्ध उससे सुहोत्र, उससे गृत्समद। गृत्समद से चार वर्ण बने। वायु पुराण को यह स्वीकार नहीं। उसका कहना है कि वर्ण गृत्समद पौत्र शौनक से उत्पन्न हुए। ‘हरिवंश’ एक स्थान पर विष्णु पुराण का मत स्वीकार कर लेता है कि वर्णों का जनक गृत्समद था किन्तु उसमें अन्तरन यह है कि शूद्र उससे उत्पन्न नहीं हुए। यह पुराण नहीं बताता फिर शूद्र कहां से आ गए? एक अन्य स्थान पर वह कहता है कि वर्ण गृत्समद के पुत्र शुनक से निकले। इस प्रकार अपनी ही बात काटता है और विष्णु पुराण और वायु पुराण से भी भिन्न मत प्रकट करता है।

यह व्याख्या अल्पबुद्धि की सनक लगती है। इससे पता चलता है कि वर्ण-व्यवस्था का औचित्य ठहराने के लिए ब्राह्मणों ने किस प्रकार एड़ी-चोटी का जोर लगाया। प्रश्न यह है कि ब्राह्मण इस व्यवस्था के इतने दृढ़ प्रचारक थे तो वर्ण-व्यवस्था के उद्गम पर एक ही बात पर जम क्यों नहीं सके। एक समान और निर्विवाद ग्राह्य और बौद्धिक व्याख्या क्यों नहीं दे पाए?

इन अनेक व्याख्याओं में से वर्ण-व्यवस्था के औचित्य में ब्राह्मण केवल दो पर ही ठहरते हैं।