परिशिष्ट-I: वर्णाश्रम धर्म की पहेली - Page 256

परिशिष्ट- I

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ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र। एक स्वरूप अनेक कार्य, दो पैरों पर चलने वाला अत्यंत आश्चर्यजनक, शक्तिमान और अपने व्यवसाय में पारंगत। तीन उच्च वर्णों के संस्कारों का वेदों में निर्धारण हुआ। प्राणियों की योगावस्था से ब्रह्मा प्रकट हुए। विष्णु जैसी उसे ध्यानावस्था से भगवान प्रचेतस (दक्ष) अर्थात् महान योगी विष्णु अपनी मेधा एवं ऊर्जा से ध्यानावस्था से कर्मक्षेत्र में उतरे। अपशिष्ट से शूद्र उपजे वे संस्कार रहित हैं। इस कारण वे शुद्धि संस्कारों में सम्मिलित नहीं हो सकते। न ही पवित्र विज्ञान से उनका संबंध है। वैसे ही जैसे ईंधन के घर्षण से अग्नि उत्पन्न होती है और लुप्त हो जाती है। उसकी यज्ञ में कोई आश्वयकता नहीं। इसी प्रकार धरती पर घूमने वाले शूद्र हैं। कुल मिलाकर (बलि देने के अतिरिक्त किसी उपयोग के नहीं) अपने जन्म के कारण, उनका जीवन शुद्धता से वंचित रखा गया है और उनकी अनावश्यकता वेदों में नियत है।य्

अन्त में भागवत पुराण ख्1,

फ्कई सहस्र वर्षों के उपरांत अपने कर्मों और प्राकृतिक गुणों से तत्कालीन प्राणियों ने जल पर उतराते अण्डज को जीव रूप प्रदान किया। फिर पुरुष ने उसका विखण् डन कर उससे एक सहस्र जंघाएं, चरण, भुजाएं, चक्षु, मुख और शीर्ष प्रकट किए। विश्व-व्यवस्थापक ने अपने सहयोगी ऋषियों के साथ विश्व की रचना की। उन्होंने अपने कटि से सात अधोभुवन रचे और ऊर्घ्व मूल से और सात ऊर्घ्व भुवनों की रचना की। ब्राह्मण पुरुष का मुख था, क्षत्रिय उसकी भुजाएं, वैश्य उसकी जंघाओं से उपजे और शूद्र उस देव पुरुष के चरणों से जन्मे। पृथ्वी उनके पैरों से बनी। वायु उनकी नाभि से, उनके हृदय से स्वर्ग और उनके वक्ष से महालोक बने।य्

अब अंत में वायु पुराण देखें। यह क्या कहता है? इसके अनुसार मनु ने वर्ण-व्यवस्था रचीः

फ्गृत्समद का पुत्र शुनक था। उससे शौनक जन्मा। उसी के परिवार में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र उत्पन्न हुए। द्विज मानव विभिन्न कर्मों के साथ जन्मे।’

यह सर्वेक्षण हमें क्या प्रदर्शित करता है? यदि परिणाम निकलता है तो वह है कि ब्राह्मणों ने वर्ण-व्यवस्था की व्याख्या करने के लिए कैसी अव्यवस्था की स्थिति उत्पन्न कर दी है। इन व्याख्याओं में एकरूपता नहीं है और ना ही कोई बात निश्चित रूप से कही गई है। एक ही स्रोत ने जो व्याख्याएं दी हैं, उनमें से कुछ पौराणिक हैं, कुछ रहस्यात्मक और बौद्धिक हैं। सभी का तात्पर्य इस व्यवस्था की व्याख्या करना है।

  1. म्यूर, संस्कृत टैक्स्ट, खंड 1, पृ. 156