244 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
II
आश्रम-धर्म में जीवन को चार चरणों में विभाजित किया है- 1. ब्रह्मचर्य, 2. गृहस्थाश्रम, 3. वानप्रस्थ, और 4. संन्यास। ब्रह्मचर्य की औपचारिक दोनों अवस्थाओं का समान अर्थ है, अविवाहित जीवन। इसका औपचारिक अर्थ है गुरु से शिक्षा ग्रहण करना। गृहस्थाश्रम वह अवस्था है जब कोई व्यक्ति वैवाहिक जीवन बिताता है। संन्यास वह है जब कोई व्यक्ति वैराग्य ले लेता है। वानप्रस्थ, गृहस्थाश्रम और संन्यास के मध्य की स्थिति है। यह वह स्थिति है जब कोई व्यक्ति समाज का अंग होते हुए भी उससे पृथक रहता है। जैसा कि नाम से प्रकट है, इसका अर्थ है जंगलों में रहना।
हिंदुओं का विश्वास है कि आश्रम-धर्म ऐसी संस्था है जो वर्ण-धर्म के समान प्राचीन है। वे इन दोनों को एक साथ मिलाकर वर्णाश्रम-धर्म कहते हैं क्योंकि ये दोनों ही संश्लिष्ट हैं, और दोनों ही मिलकर हिन्दूधर्म का लौहस्वरूप निर्माण करती हैं।
यह उचित रहेगा कि हम आश्रम-धर्म का प्रादुर्भाव, प्रयोजन और विशिष्टता पर विचार करने से पूर्व हम इसका पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर लें। आश्रम-प्रथा के दिग्दर्शन का सर्वोत्तम स्रोत मनुस्मृति है, जिसमें से निम्नांकित अंशों को उद्धृत किया जा रहा हैः
अध्याय 2.36. फ्ब्राह्मण के पुत्र का गर्भधारण के आठ वर्ष पश्चात् उपनयन संस्कार कराया जाए। क्षत्रिय गर्भधारण के ग्यारह वर्ष पश्चात्, किन्तु वैश्य का बारह वर्ष उपरांत।य्
अध्याय 2.168. फ्कोई द्विज यदि वेदाभ्यास नहीं करता है और अन्य का (सांसारिक ज्ञान) अध्ययन करता है, वह शीघ्र ही, अपितु अपने जीवनकाल में ही शूद्र और उसकी संतत की स्थिति प्राप्त करता है।य्
अध्याय 3.1. फ्गुरु के अधीन तीन वेदों का व्रत छत्तीस वर्ष तक धारण किया जाए अथवा इसके अर्द्धांश अथवा चतुर्थांश अथवा जब तक उनका पूरा ज्ञान न हो जाए, यह व्रत रखा जाए।य्
अध्याय 3.2. फ्जो उचित क्रम से तीन वेदों अथवा दो अन्यथा एक का भी अध्ययन बिना नियमोल्लंघन कर लेता है, वह गृहस्थाश्रम में प्रवेश करे।य्
अध्याय 6.8. फ्विद्यार्थी, गृहस्थ, बैरवानस और तापस इनकी चार स्थितियां हैं, जिन सबका उद्गम गृहस्थ है।य्
अध्याय 6.88. फ्किन्तु सभी (अथवा) कोई एक अवस्था भी विधानानुकूल एकोपरांत हो ब्राह्मण को उच्च स्थिति प्रदान करती है जो इनका नियमानुसार पालन करता हो।य्