परिशिष्ट-I: वर्णाश्रम धर्म की पहेली - Page 260

परिशिष्ट- I

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अध्याय 6.89. फ्और वैदिक नियमानुसार और स्मृति के अनुरूप गृहस्थ को श्रेष्ठतम बताया गया है क्योंकि वह अन्य तीनों का सहायक है।य्

अध्याय 6.1. फ्कोई द्विज स्नातक, जो नियमानुसार गृहस्थ-धर्म निभा चुका हो, वह दृढ़ संकल्प करे कि वह अपनी इन्द्रियों का दमन करेगा, वनों में रहेगा (निम्नांकित नियमानुसार)।य्

अध्याय 6.2. फ्जब कोई गृहस्थ यह देखे कि उसकी त्वचा में झुर्रियां पड़ने लगी हैं और उसके बाल पकने लगे हैं और उसके पुत्रों को पुत्र हो गए हैं तब वह वन को प्रस्थान करे।य्

अध्याय 6.33. फ्परन्तु इस भांति अपने जीवन का तीसरा भाग वनों में व्यतीत करने के उपरांत चौथेपन में वह सभी सांसारिकताओं का परित्याग कर तापस का जीवन बिताए।य्

अध्याय 6.34. फ्जो चरण तापस के रूप में प्रति चरण यज्ञ करके और इन्द्रियों का दमन करके क्लांत हो जाता है। (भिक्षादान और भोजन कराकर), वह मृत्यु उपरांत सुख भोगता है।य्

अध्याय 6.35. फ्जब वह तीनों ऋणों से उऋण हो जाता है तो मोक्ष के लिए सुरति लगाए, जो उऋण हुए बिना मुक्ति चाहता है, उसका पतन होता है।य्

अध्याय 6.36. फ्नियमानुसार वेदाध्ययन, पवित्र विधानानुसार पुत्रवान होकर, योग्यतानुसार यज्ञ करके वह अपना ध्यान मोक्ष पर लगाए।य्

अध्याय 6.37. फ्कोई द्विज, जो वेदाध्ययन बिना, पुत्रवान हुए बिना, यज्ञ के बिना मोक्ष चाहता है, वह नरक में जाता है।य्

इन नियमों से यह स्पष्ट है कि मनु के अनुसार आश्रम-धर्म के तीन रूप हैं। प्रथम यह कि यह शूद्रों और महिलाओं के लिए नहीं है। द्वितीय यह कि ब्रह्मचर्य अनिवार्य है। ऐसे ही गृहस्थ भी। वानप्रस्थ और संन्यास अनिवार्य नहीं है। तृतीय यह कि इनका निर्धारित क्रम से पालन किया जाए। प्रथम ब्रह्मचर्य, द्वितीय गृहस्थ, तृतीय वानप्रस्थ और चतुर्थ संन्यास। कोई एक को लांघकर दूसरे आश्रम में नहीं जा सकता।

व्यक्तिगत जीवन में मनु द्वारा नियोजित अर्थ-व्यवस्था के लिए बताई जाने वाली इस आश्रम-प्रणाली पर विहंगम दृष्टि डालने पर कुछ प्रश्न उत्पन्न होते हैं। वेदों के संदर्भ में आश्रमों का यह सिद्धांत अज्ञात है। वेदों में ब्रह्मचारी का उल्लेख है परन्तु ब्रह्मचर्य को जीवन का प्रथम और अनिवार्य सोपान बनाए जाने का कोई प्रसंग नहीं है। ब्राह्मणों ने व्यक्तिगत जीवन में ब्रह्मचर्य को अनिवार्य क्यों बनाया। आश्रम धर्म के संबंध में यह प्रथम गोरखधंधा है।