दूसरी पहेली: वेदों की उत्पत्ति-ब्राह्मणों की व्याख्या अथवा वाग्जाल का एक प्रयास - Page 27

12 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

सुनाया, और सूर्य ने सुनाया। इसे अमान्य नहीं किया जा सकता, क्योंकि वेद कहता है कि ऋग्वेद अग्नि की देन है, यजुर्वेद वायु और सामदेव सूर्य ने दिया है।

कुल्लूक भट्ट की बात समझने के पूर्व कल्प का अर्थ समझना आवश्यक है। कल्प वैदिक ब्राह्मणों द्वारा की जाने वाली काल गणना है। ब्राह्मणों ने काल की इस प्रकार गणना की है- 1. वर्ष, 2. युग, 3. महायुग, 4. मन्वंतर, 5. कल्प।

वर्ष को बड़ी सफलता से समझा जा सकता है। यह साल का समानांतर शब्द है। युग कितनी अवधि का होता है, इस पर मतैक्य नहीं है।

चार युगों को मिलाकर एक महायुग बनता है। 1. कृतयुग, 2. त्रेता युग, 3. द्वापर और 4. कलियुग। चार युगों का यही क्रम रहता है। जब प्रथम युग समाप्त हो जाता है तो द्वितीय युग आरम्भ होता है। यही क्रम आगे चलता है। जब एक चक्र पूरा हो जाता है तो महायुग होता है।

प्रत्येक महायुग कृतयुग से आरंभ होकर कलियुग पर समाप्त होता है।

महायुग और कल्प के विषय में कोई अनिश्चितता नहीं है। 71 महायुग एक कल्प बनाते हैं, फिर भी महायुग और मन्वंतर काल के अंतराल के संबंध में कुछ अनिश्चितता है। एक मन्वंतर 71 महायुगों के बराबर होता है या ‘‘कुछ अधिक’’ जिसके विषय में निश्चय नहीं है। ‘‘कुछ अधिक’’ समय का क्या अर्थ है-ब्राह्मण इस बारे में निश्चित रूप से कुछ नहीं बता पाते। परिणामस्वरूप मन्वंतर और कल्प के बीच का समय निर्धारित हो ही नहीं पाता।

परन्तु हमारा इससे विशेष प्रयोजन नहीं। फिलहाल कल्प तक सीमित रहें।

कल्प का सृष्टि और प्रलय से घनिष्ट संबंध बताया गया है। सृष्टि उसका आरंभ है और प्रलय कल्प का अंत। इस प्रकार वेदों की उत्पत्ति कल्प से जुड़ी हुई है।

इसका अर्थ यह हुआ कि कल्प के आरंभ से सृष्टि आरंभ होती है और प्रत्येक कल्प में वेदों की नई शृंखला शुरू होती है। कुल्लूक यह कहना चाहते हैं कि प्रत्येक कल्प में नए वेदों की रचना होती है और ब्रह्मा अपनी स्मृति से उसे पुनः स्थापित करते हैं। इसी कारण वे वेदों को अनादि-अनंत कहते हैं अर्थात् वे सनातन हैं।

जो कुल्लूक भट्ट कहते हैं वह है कि वेद स्मृति से उत्पन्न होते हैं। वास्तविक प्रश्न यह है कि उनकी रचना किसने की? यह प्रश्न नहीं है कि उन्हें स्मृति से कौन सुनाता है? यदि स्वीकार कर भी लिया जाए कि प्रत्येक कल्प के आरंभ में उनकी पुनरावृत्ति होती है तो जब प्रथम कल्प आरंभ हुआ था तो उनकी रचना किसने की? वेद स्वतः प्रसूत तो हो नहीं सकते। यदि अनंत हों भी तो अनादि नहीं हो सकते। ब्राह्मण स्पष्ट क्यों नहीं बताते? यह वाग्जाल क्यों?