दूसरी पहेली: वेदों की उत्पत्ति-ब्राह्मणों की व्याख्या अथवा वाग्जाल का एक प्रयास - Page 26

दूसरी पहेली

वेदों की उत्पत्ति

ब्राह्मणों की व्याख्या अथवा वाग्जाल का एक प्रयास

कोई हिंदू ऐसा नहीं मिलेगा जो वेदों को अपने धर्म का पवित्रतम ग्रंथ न मानता हो। फिर भी किसी हिंदू से पूछें, वेदों की उत्पत्ति कैसे हुई? इस सादे प्रश्न का उसके लिए स्पष्ट और निश्चित उत्तर दे पाना कठिन होगा। फिर भी यदि किसी वैदिक ब्राह्मण से प्रश्न किया जाए तो वह तुरंत कहेगा कि वेद सनातन है। परंतु इस प्रश्न का यह उत्तर नहीं है। सबसे पहले हम सब यह जानें कि ‘सनातन’ शब्द का क्या अर्थ है?

‘सनातन’ शब्द की सबसे अच्छी व्याख्या कुल्लूक भट्ट ने मनुस्मृति के भाष्य के प्रथम अध्याय, श्लोक 22-23 में विशुद्ध रूप से की है। कुल्लूक भट्ट ‘सनातन’ शब्द की व्याख्या करता हैः ख्1,

‘सनातन’ का अर्थ है ‘अनादि’, अनन्त’। वेदों की दिव्य उत्पत्ति का सिद्धांत मनु ने प्रतिपादित किया। वही वेद पूर्व सृष्टि कल्प से ही ब्रह्मा की श्रुति में संरक्षित है जो दिव्यात्मा है। वर्तमान कल्प के आरंभ में यही वेद थे, उसे अग्नि ने सुनाया, वायु ने

  1. मयूर, संस्कृत टैक्स्ट, खंड 3, पृ. 6

प्रस्तुत अध्याय के मूल अंग्रेजी में ‘वेदों की उत्पत्ति’ के बारे में 72 पृष्ठ प्राप्त हुए। ये पृष्ठ न तो ठीक तरह से व्यवस्थित थे और न ही इन पर टाइपिस्ट अथवा लेखक की ओर से पृष्ठ संख्या डाली गई थी। हमने इन खुले पृष्ठों को सुव्यवस्थित ढंग से संकलित करने का प्रयास किया और उन्हें पहेली नं. 2 से 6 में रखने का फैसला किया, जैसा कि विषय-सूची 2 में उल्लिखित है_ यह फैसला करना बहुत कठिन है कि ये सभी पृष्ठ ठीक तरह से सही विषय और अध्याय के साथ जोड़ दिए गए हैं या नहीं।

बहरहाल 61 पृष्ठों का एक अलग अध्याय है जिसे ‘वेदों की पहेली शीर्षक’ के अधीन रखा गया है_ वह परिशिष्ट 1 में शामिल किया गया है। अनुक्रमणिका में उन निबंधों को क्रम संख्या 2 से 6 पर संकलित रूप में दिखाया गया है। प्रबंध में कई परिच्छेदों की पुनरावृत्ति हुई है। अध्याय 2 से 6 तक की मूल पांडुलिपि में लेखक की ओर से ही संशोधन और परिमार्जन किये गये हैं। जो सामग्री परिशिष्ट एक में रखी गई है, वह टाइप पृष्ठों की दूसरी प्रति है और उसमें बिल्कुल संशोधन नहीं है। हमने विषय-सूची और पृष्ठों का क्रम और पांडुलिपि के पृष्ठों को तदनुसार व्यवस्थित किया है। - संपादक