परिशिष्ट- II
6.23. फ्ग्रीष्म में वह पंचाग्नि ताप सहे, पावस में मुक्ताकाश में रहे, शीतकाल में भीगे वस्त्र पहने, ऐसे वह अपने तप की शक्ति बढ़ाए।य्
6.24. फ्जब वह दिन में तीन बार (प्रातः, दोपहर, संध्या) को स्नान करता है तो वह देवताओं को अर्घ्य चढ़ाए और कठोर से कठोर संयम बरते, वह अपनी देह सुखा डाले।य्
6.25. फ्निर्धारित नियमानुसार पवित्र त्रियाग्नि को आत्मसात करे, वह बिना अग्नि के रहे, बिना घर रहे, मौन रहे, कंदमूल और फलों के आहार पर रहे।य्
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