परिशिष्ट-II: अनिवार्य वैवाहिक व्यवस्था - Page 277

262 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

कंद मूलों और उन फलों का आहार

करे जो समय पर पके हों और स्वयं

वृक्षों से टपके हों।य्

6.22. फ्वह या तो भूमि पर लेटे

अथवा दिन में पंजों पर खड़ा रहे

अथवा वह एक बार खड़ा रहे एक

बार बैठे। संन्यास प्रमाण (सूर्योदय,

दोपहर, गोधूलि) पर (नहाने को)

वन से जल लाए।य्

VI. पालनार्थ कर्त्तव्य

वानप्रस्थ संन्यासी

6.5. फ्तापसों के अनुकूल विभिन्न 6.65. फ्गहन ध्यानावस्था से वह प्रकार के पवित्र भोजन अथवा जड़ी- परमात्मा की सूक्ष्मता को और प्राणी बूटियां, कंदमूल और फल देकर मात्र में उसकी उपस्थिति को जाने, वह नियमानुसार पंच आहुतियां दे।य् उच्चतम भी निम्नतम भी।य्

6.7. फ्वह ऐसे आहार की आहुति 6.83. फ्वह निरंतर वेदपाठ करे जो दे जो वह लेता हो और क्षमतानुसार यज्ञ-प्रसंग में हैं, देवों से सम्बद्ध हैं, भिक्षा दे, जो उसके आश्रम में आएं, जो आत्मा से सम्बद्ध हैं और वेदों के उसे जल, कंदमूल और फल देकर उपसंहार (वेदांत) में सन्निहित हैं।’’ समादर प्रदान करे।य्

6.8. फ्वह अकेला वेद पाठ करे,

वह अभावों के प्रति धैर्यवान रहे,

(सबसे) मैत्री बरते, सदैव उदार

रहे, कदापि उपहार ग्रहण न करे,

सभी जीवों के प्रति कृपालु रहे।य्

6.9. फ् वह पवित्र त्रि-अग्नियों से

नियमानुसार अग्निहोत्र करे, पूर्णिमा

और अमावस्या को उचित समय यज्ञ

करना न भूले।य्

6.10. फ्वह नक्षत्रेष्टि, आग्रहायण,

चातुर्मास्य यज्ञ और साथ ही उत्तरायण

और दक्षिणायन यज्ञ नियम से करे।य्