इक्कीसवीं पहेली: मन्वतर का सिद्धांत - Page 282

इक्कीसवीं पहेली

मन्वंतर का सिद्धान्त

ब्राह्मणों का एक सिद्धान्त था कि उनके देश का शासन स्वर्ग से चलता है। मन्वंतर का यही अर्थ प्रतीत होता है।

मन्वंतर का आशय देश की राजनीतिक सत्ता से है। इसके पीछे यह विश्वास है कि निश्चित अवधि के लिए सत्ता एक निगम को सौंप दी जाती है। इस समूह में एक मनु होता है, सप्तऋषि ओर एक इन्द्र होता है जो स्वर्ग में अपने आसनों से प्रजा से पूछे बिना अथवा इच्छा जाने बिना शासन-सूत्र चलाता है। एक समूह के शासन-काल को, जिसमें मनु की सत्ता सर्वोपरि है, मन्वंतर कहते हैं। एक मनु का शासनकाल समाप्त हो जाता है तो दूसरा आ जाता है। यह क्रम चलता रहता है। युगों की भांति मन्वंतर का भी समय-चक्र है। चौदह मन्वंतरों का एक चक्र होता है। विष्णु पुराण से मन्वंतरों का आभास मिलता है जो इस प्रकार हैः

फ्तब ब्रह्मा ने सृष्टि-पालन हेतु स्वयं को मनु स्वायंभुव बना लिया। जो स्वयंमेव मौलिक रूप में एक रूप जन्मे, और अपने नारीभाग से उन्होंने शतरूपा को रचा जिसे सृजित प्राणियों की रक्षा हेतु तपस्या द्वारा वर्जित वैवाहिकता के पाप से शुद्ध किया जिसे मनु स्वयंभुव ने अपनी पत्नी बनाया।य्

एक क्षण को हम यहां ठहरकर विचार करते हैं, इसके क्या अर्थ हैं? क्या इसका अर्थ यह है कि ब्रह्मा उभयलिंगी थे? क्या इसका अर्थ यह है स्वायंभुव मनु ने अपनी बहन शतरूपा को पत्नी बना लिया? विषणु पुराण के अनुसार यदि यह सही है तो कितना विचित्र है? विष्णु पुराण का आगे कथन हैः

फ्इस युगल से दो पुत्र जन्मे, प्रियव्रत और उत्तानपाद, और दो पुत्रियां जन्मीं, प्रसूति और आकूति जो अत्यन्त लावण्यमयी और गुणवान थीं। प्रसूति का विवाह दक्ष से और आकूति का रुचि प्रजापति से। आकूति से जुड़वा बच्चे उत्पन्न हुए यज्ञ और दक्षिणा

यह 11 पृष्ठों की पाण्डुलिपि हैः अंतिम चार पृष्ठ लेखक के हस्तलिखित हैं। - संपादक