14 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
II
वेदों को अपनी उत्पत्ति के बारे में स्वयं ही बताना है। वेदों के पश्चात् ब्राह्मण ग्रन्थ आते हैं। हमको यह पूछताछ करनी ही चाहिए कि वे इस संबंध में क्या कहते हैं। केवल शतपथ ब्राह्मण, तैत्तरीय ब्राह्मण, ऐतरेय ब्राह्मण, कौषीतकि ब्राह्मण में वेदों की उत्पत्ति की व्याख्या की गई है।
शतपथ ब्राह्मण में कई व्याख्याएँ हैं। एक प्रजापति ख्1, को वेदों का सृष्टा मानती है। उसके अनुसारः
‘‘आरंभ में एकमेव प्रजापति ही ब्रह्माण्ड थे, उनकी इच्छा हुई ‘‘मेरी अभिवृद्धि हो, मेरा विस्तार हो।’’ उन्होंने उपासना की, तप किया।’’
‘‘जब वे उपासनालीन थे, ध्यानस्थ थे तो तीन तत्वों की उत्पत्ति हुई, पृथ्वी, वायु
और आकाश। उन्होंने इसमें ऊष्मा का संचार किया। उस ऊष्मा से तीन तेज उत्पन्न
हुए, अग्नि जो शुद्ध करती है, पवन अथवा वायु और सूर्य। इन तीनों तेजों में
ऊष्मा का संचार किया। उनके ताप से तीन वेद उत्पन्न हुए। अग्नि से ऋग्वेद,
वायु से यजुर्वेद, सूर्य से सामवेद। उन्होंने उन तीन वेदों में ऊष्मा का संचार किया,
उनमें से तीन तेजोमय तत्वों की उत्पत्ति हुई। ‘‘भू’’ ऋग्वेद से, ‘‘भुवः’’ यजुर्वेद
से और ‘‘स्व’’ सामवेद से निकले। अब ऋग्वेद अध्वर्यु का अधिष्ठाता बना, और
सामवेद उद्गत्रि का कर्ता बना और तीन विधाओं से ब्राह्मण का कार्य, इन तत्वों
के माध्यम से निर्धारित हुआ (जैसे कि तीनों वेद आपस में एक हैं)’’।
शतपथ ब्राह्मण प्रजापति से वेदों की उत्पत्ति ख्2, की भिन्न व्याख्या करता है। वह कहता है कि प्रजापति ने जल से वेदों की रचना की। शतपथ ब्राह्मण कहता है किः
‘‘पुरुष प्रजापति की इच्छा हुई, ‘‘मेरी अभिवृद्धि हो, मेरा विस्तार हो’’। वे उपासना में
बैठ गए, उन्होंने घोर तप किया। इस तप से उन्होंने सर्वप्रथम पवित्र त्रिवेद विज्ञान प्रज्ञा
की रचना की। यह उनका आधार बना। उन्होंने कहा प्रज्ञा ब्रह्माण्ड का मूल है। वेदों
के अध्ययन के पश्चात् पुरुष को स्थायी आधार मिलता है क्योंकि प्रज्ञा उसकामूल है।
इस आधार पर प्रजापति ने घोर तप किया। उन्होंने वाच (वाणी) से जल की रचना
की। उन्होंने वाच की भी रचना की थी। उसके विस्तरण से जल ‘‘अप्प’’ कहलाया।
उसकी सर्वत्र व्यापकता से वह ‘‘वार’’ बना। उन्होंने चाहा ‘‘मेरा जल से विस्तार हो’’
इस त्रिवेद विज्ञान से वे जल में प्रविष्ट हुए। तब एक अण्डज उभरा। उन्होंने
उसे सरकाया और कहा- ‘‘भव भव पुनर्भव’’। तब प्रज्ञा का जन्म हुआ त्रिवेद
म्यूर, संस्कृत टैक्स्ट, खंड 3, पृ. 5
वही पृ. 8