तीसरी पहेली: वेदों की उत्पत्ति पर अन्य शास्त्रों के साक्ष्य - Page 30

तीसरी पहेली

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विज्ञान। फिर पुरुष ने कहा प्रज्ञा ब्रह्मांड की प्रथम सृष्टि है। पुरुष के समक्ष

सर्वप्रथम प्रज्ञा की रचना हुई, इसलिए यह उसका मुख बनी। इस प्रकार वे आगे

कहते हैं, ‘‘वह अग्नि के समान हैं क्योंकि प्रज्ञा अग्नि का मुख है।’’

शतपथ ब्राह्मण में तीसरी व्याख्या इस ख्1, प्रकार दी गई है-

‘‘मस्तिष्क सागर है। मानस सागर से वाच द्वारा भगवान ने कुदाली से त्रिवेद विज्ञान

को खोद कर बाहर निकाला। तत्पश्चात् इस मंत्र का उच्चारण किया-प्रज्ञावान

देवता जाने।’’ उन्होंने उस सामग्री को कहाँ रखा जिसे ईश्वर ने तेजधार कुदाली

से खोदकर बाहर निकाला था। मस्तिष्क समुद्र है, वाच तीव्रधार कुदाली है।

त्रिवेद विज्ञान समिधा है। इस संदर्भ में इस मंत्र को उच्चारा। वह मस्तिष्क में

समा गया।’’

ब्राह्मण की तीन व्याख्याएँ हैं। वह कहता है कि वेदों के कर्ता प्रजापति हैं। वह यह भी कहता है कि प्रजापति ने राजा सोम को बनाया और तत्पश्चात् तीन वेदों की रचना ख्2, की गई। इस ब्राह्मण की दूसरी व्याख्या ख्3, का प्रजापति से कोई तात्पर्य नहीं। इसके अनुसारः

‘‘वाच (वाणी) अविनाशी है, यह पूज्यों में प्रथम प्रसूत है, वेदों की जननी और

अनश्वरता का केन्द्र बिंदु है, हममें आनंदोपार्जन कर वह यज्ञ में प्रवेश करती है।

मेधावी ऋषि, मंत्रों के सृष्टा, जिसका अनुग्रह, तप और कठोर उपासना से प्राप्त

करते हैं, ऐसी रक्षा की देवी सरस्वती मेरा आह्वान सुनने को उद्धत हो।’’

इस सबके ऊपर ब्राह्मण तीसरी व्याख्या देता है। वह कहता है कि वेद प्रजापति ख्4, की दाढ़ी से उत्पन्न हुए।

III

उपनिषदों ने भी वेदों की उत्पत्ति की व्याख्या की है।

छान्दोग्य उपनिषद की व्याख्या शतपथ ब्राह्मण के समान ख्5, है। अर्थात् ऋग्वेद अग्नि से उत्पन्न हुआ। यजुर्वेद वायु से और सामदेव सूर्य से।

बृहदारण्यक उपनिषद ने दो व्याख्याएँ दी हैं। एक स्थान पर उसमें कहा गया है ख्6, ः

  1. म्यूर, संस्कृत टैक्स्ट, खंड 1, पृ. 9-10

  2. वही पृ. 8

  3. वही पृ. 10

  4. वही पृ. 10

  5. वही पृ. 5

  6. वही पृ. 8