284 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
कलियुग की आयु 1000 वर्ष बताई जाने के बावजूद आज तक विद्यमान है। संध्या और संध्यांश को जोड़कर इसका काल 1200 वर्ष और बढ़ा दिया गया।
दूसरी बात यह है कि इसमें एक नया अनुसंधान कर लिया गया है। उनका कहना है कि युगों की जो अवधि नियत की गई थी, वह देवताओं के वर्ष के अनुसार है, मानव-वर्षों की तरह नहीं। वैदिक ब्राह्मणों के अनुसार, देवताओं का एक दिन धरती के एक वर्ष के बराबर है। इस प्रकार कलियुग का समय जो 1000 वर्ष और 200 (दो सौ) वर्ष था, संध्या और संध्यांश मिलाकर 1200 वर्ष बैठता है, वह अब हो गया (1200 × 360) अर्थात् 4,32,000 वर्ष। जिस कलियुग की समाप्ति की घोषण् ा 165 ईसा पूर्व कर देनी चाहिए थी और जैसा कि ज्योतिषाचार्य ने ही गणना की थी, इस प्रकार वैदिक ब्राह्मणों ने दो प्रकार से उसकी अवधि 4,32,000 वर्ष की कर दी है। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि कलियुग अब भी चालू है और लाखों वर्ष तक चलता रहेगा। कलियुग का अंत ही नहीं होगा।
IV
कलियुग का अर्थ क्या है? कलियुग का अर्थ है, अधर्म का युग, ऐस युग जो अनैतिक है, ऐसा युग जिसमें राजा द्वारा बनाए गए विधान का पालन नहीं किया जाता। सहसा एक प्रश्न उठता है। कलियुग पूर्व युगों की अपेक्षा अधिक अनैतिक क्यों हैं? कलियुग से पूर्व युगों में आर्यों के नैतिक मूल्य क्या थे? यदि कोई व्यक्ति बाद के आर्यों की प्रवृत्तियों और उनके सामाजिक व्यवहार की तुलना प्राचीन आर्यों से करेगा तो उसमें आश्चर्यजनक सुधार पाएगा और उनके व्यवहार और नैतिकता में सामाजिक क्रांति का पता चलेगा।
वैदिक आर्यों का धर्म बर्बर और अश्लील था। उस समय नरमेध यज्ञ हुआ करते थे। इसका यजुर्वेद संहिता, यजुर्वेद ब्राह्मण, सांख्यायन और वैतानसूत्र में सविस्तार वर्णन है।
प्राचीन आर्य लिंग पूजा करते थे। लिंग पूजा को स्कंभ कहते थे, जो आर्य धर्म का अंग थी जैसा कि अथर्ववेद के मंत्र 10.7 में है। एक और अश्लीलता थी, जिसने प्राचीन आर्य धर्म को विकृत किया हुआ था। वह था अश्वमेध यज्ञ अथवा घोड़े की बलि। अश्वमेध यज्ञ का एक आवश्यक हिस्सा यह था कि मेधित (मृत अश्व) का लिंग यजमान की मुख्य पत्नी की योनि में ब्राह्मणों द्वारा पर्याप्त मंत्रोच्चार करते हुए डाला जाता था। वाजसनेयी संहिता का एक मंत्र 23.18 प्रकट करता है कि रानियों के बीच इस बात के लिए प्रतिस्पर्धा रहा करती थी कि घोड़े से योजित होने का श्रेय किसे प्राप्त होता है? जो इस विषय में और अधिक जानना चाहते हैं, वे यजुर्वेद की महीधर की टीका में और विस्तार से पढ़ सकते हैं, जहां वह इस वीभत्स अनुष्ठान का पूरा विवरण देते हैं जो आर्य धर्म का अंग थी।