तेईसवीं पहेली: कलियुग - ब्राह्मणों ने इसे अनंत क्यों बनाया? - Page 298

तेइसवीं पहेली

283

खंड, में साठ वर्ष के वर्ष चक्र में जो प्राध्व से आरंभ होकर क्षय और अक्षय पर समाप्त होता है और जिसे विष्णु की आज्ञा से अमुक वर्ष दक्षिणी और उत्तरी अयन में अमुक शुक्ल या कृष्ण पक्ष, अमुक तिथि को मैं अमुक (नाम) अनुष्ठान के उद्देश्य से परमपिता के नाम पर संकल्प करता हूं।य्

हमारे समक्ष प्रश्न यह है कि वैदिक ब्राह्मण कलि को क्यों जारी रखना चाहते हैं जबकि ज्योतिषाचार्य के अनुसार वह बीत चुका है? पहली बात यह देखनी है कि कलि युग का मूल समय क्या है? विष्णु पुराण के अनुसारः

कृत युग चार हजार वर्ष का है, त्रेता तीन हजार वर्ष का, द्वापर दो हजार वर्ष का और कलियुग एक हजार वर्ष का। ऐसा उनका कथन है कि जो भूतकाल को जानते हैं।

इस प्रकार वास्तविकता यह है कि कलियुग केवल एक हजार वर्ष का होता है। यह स्पष्ट है कि वे वैदिक ब्राह्मणों तक की गणना के अनुसार कलियुग कब का बीत चुका होता। परन्तु अभी नही बीता है। कारण क्या है? यह स्पष्ट है कि कलियुग जितने समय का होना चाहिए उसकी अवधि को बढ़ा दिया गया है। यह दो प्रकार से हुआ है।

पहली बात यह कि इसके आदि और अंत में दो समय और जोड़ दिए गए हैं- संध्या और संध्यांश। यह बात विष्णु पुराण में उपरोक्त प्रसंग में कही गई है जो इस प्रकार हैः

फ्युग आरम्भ होने से पूर्व का काल संध्या कहलाता है........ जो युग समाप्ति से पूर्व आता है वह संध्यांश कहलाता है, उसकी अवधि भी उतनी ही होती है। संध्या और संध्यांश के मध्य के काल युग कहलाते हैं, कृत, त्रेता आदि।’’

संध्या और संध्यांश की अवधि कितनी होती है? क्या यह प्रत्येक युग के साथ अलग-अलग थी? संध्या और संध्यांश की अवधि समान नहीं थी। प्रत्येक युग के साथ उनकी अवधि भिन्न है। निम्नांकित तालिका में चार युगों और संध्या तथा संध्यांश की अवधि दी गई हैः

महायुग का नाम काल संध्या संध्यांश योग

कृतयुग 4000 400 400 4800

त्रेता 3000 300 300 3600

द्वापर 2000 200 200 2400

कलि 1000 100 100 1200

महायुग - - - 12000