परिशिष्ट-I: राम और कृष्ण की पहेली - Page 345

330 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

अप्रसन्न कर दिया। इन चुहलबाज युवकों ने कृष्ण के एक पुत्र साम्य को स्त्री के ऐसे वस्त्र पहना दिए, जिससे लगे कि उसको गर्भ ठहरा हुआ है। उसकी नाभि के नीचे लोहे की मूसली लटका दी और ऋषि से पूछा, फ्यह स्त्री क्या जनेगी?य् क्रोध से भरे ऋषि ने कहा, फ्ये स्त्री मूसली जनेगी, जिनसे यादवों का विनाश होगा।य् शाप से भयभीत होकर वे मूसली को समुद्र के किनारे ले गए और उसे घिस-घिस कर बुरादा बना दिया। परन्तु इसके कणों से धारदार घास सरकंडे पैदा हुए जिसकी उन्होंने संटियां बना लीं। इन्हीं संटियों से मार-मार कर यादवों ने परस्पर संहार कर डाला। वे आमोद-प्रमोद के लिए प्रभास गए। जहां उन्होंने सुरापान किया जो उनके विनाश का कारण बनी। सुरापान की लत इतनी फैल गयी कि कृष्ण और अन्य यादव प्रमुखों ने इसे मौत का पैगाम बताकर इस पर पाबंदी लगा दी। परन्तु इसका कोई प्रभाव नहीं हुआ। नशे में धुत्त यादवों में झगड़ा हुआ और फिर मारपीट। इससे उन्होंने एक-दूसारे को मार गिराया। जब कृष्ण के अपने पुत्र मारे गए तो वे भी लड़ाई में कूद पड़े और बहुत से अपने ही लोगों को मौत के घाट उतार दिया, तब वे बलराम की खोज में गए। उन्होंने देखा कि वे समाधि में बैठे हैं और शेषनाग के रूप में उनकी आत्मा जिसका वे अवतार थे, शरीर छोड़ रही है। कृष्ण ने विचार किया कि अब उनके भी प्रयाण का समय आ गया है। तब उन्होंने अपने पिता और पत्नियों से विदा ली और उनसे कहा कि अर्जुन उनकी देखभाल करेंगे। तब वे एक वृक्ष के नीचे बैठ गए फिर अपने को पत्तियों से ढांप लिया और ध्यानमग्न हो गए। जब वे इस प्रकार बैठे तो जरा नामक व्याध ने उन्हें भूल से हिरण समझ लिया और उन पर वही तीर चला दिया जो मूसली की बची हुई कील से उसने बनाया था। अपनी गलती जान कर जरा उनके पैरों पर गिर पड़ा। कृष्ण ने उसे क्षमादान दिया और एक ज्योति-पुंज बन कर आकाश में विलीन हो गए। अर्जुन आए और बचे-खुचे यादवों को हस्तिनापुर ले गए। परन्तु उस अनुपम धनुर्धर का तेज नष्ट हो गया और उनकी भुजाओं की शक्ति जाती रही। कुछ लाठीधारी अहीरों ने उन पर आक्रमण कर दिया और बहुत सारी स्त्रियों को छीन कर ले गए और वे थोड़े-बहुत लोगों को हस्तिनापुर ला सके।

अर्जुन के जाने के पश्चात् द्वारका समुद्र में डूब गई और यादवों तथा उनका वैभव, उनके पारिवारिक विवाद और उनकी रंगरेलियां सभी का नाम मिट गया।