परिशिष्ट-1
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उन्होंने उन्हें बहुत समझाया। इसी दौरान उन्होंने असत्य भाषण का औचत्य वशिष्ठ स्मृति का उदाहरण देते हुए बताया- फ्विवाह में, प्रेम में, मृत्यु, भय के समय सर्वस्व विनाश की आशंका पर और जब ब्राह्मण का हित दाव पर हो तो इन पांच अवसरों पर असत्य भाषण पाप नहीं है।य्
युधिष्ठिर का संशय दूर हो गया और उन्होंने कहा फ्अश्वत्थामा मारा गया है।य् फिर दबे स्वर से कहा, फ्हाथी या पुरुषय् (नरो व कुंजर), वाक्य का अंतिम भाग द्रोण नहीं सुन पाए। वे पूरी तरह टूट गए और भीम की ललकार सुनकर उन्हें विश्वास हो गया। उन्होंने हथियार डाल दिए और जब वे समाधिस्थ थे तो धृष्टद्युम्न ने उनका वध कर दिया।
- जब भीम द्वैपायन सरोवर पर दुर्योधन से कठिन युद्ध कर रहे थे और उस पर पार पाने में असफल थे तो कृष्ण ने अर्जुन के माध्यम से बताया कि वे उसकी जंघाओं पर प्रहार करें। तगड़ी के नीचे वार करना वर्जित होता था, यदि अधर्म युद्ध से उसकी जंघाएं न तोड़ी जातीं तो दुर्योधन का वध नहीं हो सकता था। कृष्ण ने वहीं प्रहार कराया।
कृष्ण का देहावसान उनके चरित्र पर प्रकाश डालता है। कृष्ण का देहांत द्वारिका के राजा के रूप में हुआ। द्वारका कैसी थी और उनका निधन कैसे हुआ?
द्वारका की स्थापना करते समय कृष्ण ने वहां हजारों पतिताओं को बसाया। ‘हरिवंश’ कहता है- फ्हे शूरवीर! दैत्यों की नगरी पर यादवों की सहायता से विजय प्राप्त कर भगवान ने सहस्रों वार वनिताओं को द्वारका में बसा दिया।य् नाचते-गाते और सुरापान करते पुरुषों ने स्त्रियों और वेश्याओं से विवाह रचा लिया। वे द्वारका में फैल गईं। हमें सागर क्रीड़ा का वर्णन मिलता है जिसमें ये स्त्रियां आनन्द का प्रमुख स्रोत थीं। नृत्य और गायन से कृष्ण और बलराम भी अपनी पत्नियों सहित आमोद-प्रमोद में सम्मिलित हुए। उनके साथ ही अन्य यादव सरदार, अर्जुन और नारद भी मिल गए। फिर एक नया उत्साह फैल गया। नर-नारी समुद्र में घुस गए और कृष्ण के कहने पर पुरुष नारियों के साथ जल-क्रीड़ा में रत हो गए। कृष्ण, उत्सव के नायक थे और बलराम भी आकर्षण का केन्द्र थे। फिर सभासदों ने भी अपने संगीत से समा बांध दिया। इसके पश्चात्, खाना-पीना आरम्भ हुआ और फिर संगीत की विशेष झंकारें निकलीं जिसमें नायकों ने विभिन्न वाद्यों पर अपने कौशल दिखाए। इससे पता चलता है कि यादवगण कितने रंगीले थे और ब्राह्मणों अथवा आधुनिक परिष्कारवादियों को कैसा उत्तर दिया जो नृत्य मंडलियों और लोकमंच से नाक-भौं सिकोड़ते हैं। ऐसी ही रंगरेलियां नशे की तरंग थी जिन्होंने यादवों को बरबाद कर दिया। कहा जाता है कि अपने ऐसे ही बचकाने-पन से उन्होंने, और बाद में उनके वंशजों ने ऋषियों को