20 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
‘वेद पवित्र विधान का स्रोत है।’’ 1-1.
‘‘और वेद-विज्ञों की परम्परा और व्यवहार है।’’ 1-2
‘‘यदि समज्ञान के विद्वानों में मत-भिन्नता हो तो सुविधानुसार (किसी एक को मान्य समझने) का उसे अधिकार है।’’ 1-4
वरिष्ठ धर्म-सूत्र का विचार निम्नांकित हैः
‘‘पवित्र विधान सुनिश्चित पाठ है अर्थात् वेद और ऋषि परंपरा है।’’ 1ः4
‘‘विधान में संशय पर इन्हीं (दो स्रोतों) शिष्टों का व्यवहार प्रमाण है’’। 1-5
बौधायान के विचार इस प्रकार हैंः
प्रश्न 1 अध्याय 1, कण्डिका।
पवित्र विधान प्रत्येक वेद में है।
हम उसी के अनुसार व्याख्या करेंगे।
पवित्र नियम परम्परागत शिक्षा (स्मृ ति) का स्थान द्वितीय है।
शिष्टों का व्यवहार तृतीय।
संशय की अवस्था में - न्यूनतम दस सदस्यों का सम्मेलन (नियम के विवादित बिंदुओं पर निर्णय करें।)
आपस्तम्ब धर्म-सूत्र निम्नलिखित सूत्र में स्पष्ट कहता हैः
‘‘इसलिए अब हम योग्य कृत्यों को घोषित करते हैं जो दैनिक जीवन की रीतियों का हिस्सा है।’’ 1-1
‘इनका प्रमाण उनकी सहमति है जो नियमों को जानते हैं।’’ 1-2
‘‘विधान का प्रमाण मात्र वेद है।’’ 1-3
शिष्टों के संबंध में वशिष्ठ धर्म-सूत्र और बौधायन धर्म-सूत्र ने परिभाषित करने में विशेष सतर्कता बरती है कि शिष्ट कौन हो सकते हैं। वशिष्ठ धर्म-सूत्र कहता हैः
‘‘इच्छाओं से जिनका हृदय स्वतंत्र है’’, वे शिष्ट है।’’ 1-6
बौधायन शिष्टों की योग्यता बताने हेतु अति विस्तृत विवरण देते हैं, उनका कथन इस प्रकार है-
- शिष्ट निःसंदेह (वे हैं) जो निःस्पृह और दर्पशून्य हैं, दस दिन तक के ही अन्न-संग्रह से संतुष्ट हैं। लालसा रहित हैं, पाखंड, क्रोध, लोभ, मोह और मद रहित हैं।’’