चौथी पहेली
21
- ‘‘शिष्ट वे हैं जो पवित्र विधान के अनुरूप वेद-वेदांग के अध्येता हैं। उनका सार निकाल सकते हैं, प्रामाणिक पाठ की भांव व्याख्या कर निर्णय दे सकते हैं’’
बौधायन ने उस सम्मेलन के विषय में बहुत रोचक बात कही है जिसे निर्णय का अधिकार है। इस विषय में उसका कथन इस प्रकार हैः
‘‘वे उद्धरण भी देते हैं। (निम्नांकित मंत्र) ‘‘चार व्यक्ति, जिनमें से प्रत्येक एक वेद का ज्ञाता है, एक मीमांसक, जिसे अंगों का ज्ञान है, एक जो पवित्र विधान उद्घोषित करता है और तीन व्यवस्थाओं के तीन ब्राह्मणों को मिलाकर कम से कम दस सदस्यों का एक सम्मेलन बनता है।’’
‘‘पाँच, तीन अथवा एक निष्कलंक हो, जो पवित्र नियम का निर्णय दे। परन्तु सहस्त्र मूर्ख मिलकर भी निर्णय नहीं दे सकते।’’
‘‘अशिक्षित ब्राह्मण काठ के हाथी और चर्म निर्मित कुरंग के समान मात्र देखने की वस्तु है, काम की नहीं।’’
धर्मसूत्र ख्1, के पुनः विचार करने से पता चलता है कि किसी विवाद पर निर्णय के चार माध्यम हैं- 1. वेद 2. स्मृति 3. शिष्ट व्यवस्था, और 4. किसी सम्मेलन में सहमति के चार विभिन्न विशेषज्ञ, जिन्हें चाहिए कि वे विवादग्रस्त तथ्यों को निर्णय लेने के लिए सम्प्रेषित करें। यह भी विदित होता है कि एक समय था जब एकमात्र वेद ही भ्रमातीत संस्था नहीं थी। एक समय था जब वशिष्ट और बौधायन धर्मसूत्रों की सत्ता थी। आपस्तम्ब वेदों की सत्ता को बिल्कुल भी स्वीकार नहीं करता था। उसने सम्मेलन के सदस्यों के लिए वैदिक ज्ञान को वैकल्पिक बताया है, जिसका निर्णय ही विधान था (संप्रभुविधान)। वेदों को आधिकारिक ग्रंथ नहीं माना जाता था और सम्मेलन प्रामाणिक व्यवस्था थी जिसमें विद्वान निर्णय लेते थे। गौतम के समय में वेदों को एकछत्र प्रमाण माना गया। एक समय था जब सम्मेलन का निर्णय एक मात्र प्रमाण था। यह काल बौधायन का था।
ऐसा निष्कर्ष शतपथ ब्राह्मण द्वारा निम्नांकित उद्धरण द्वारा प्रत्यारोपित किया गया है। वे कहते हैंः
(अधूरा छोड़ दिया गया, उद्धरण और अतिरिक्त विचार-विमर्श नहीं दिया गया है।
- मैक्समूलर के अनुसार धर्म-सूत्र का समय ईसा पूर्व 200 से 600 के बीच।