26 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
कि वे रचे गए हैं। इसमें इस बात का स्पष्ट खंडन किया गया है कि वेदों का उद्भव किसी दैवी शक्ति के सुविचारित प्रयासों से हुआ है। सांख्य के अनुसार वेद प्रदीप्त सूर्य के समान हैं, जिनमें स्वयं-प्रसूत प्रकाश है और अपनी समग्रता दर्शाने तथा सृष्टि को प्रकाशित करने के लए स्वार्जित शक्ति से प्रकाशमान हैं। चाहे वह भूत हो या भविष्य, विराट हो या क्षुद्र, निकटस्थ हो या दूरस्थ, वेदांत-दर्शन दो भिन्न मत व्यक्त करता है। वह ब्रह्मा को वेदों का सृष्टा मानता है क्योंकि यह उद्गम और उद्गम का कारण भी है। उसमें ब्रह्मा को अनरनारी और नपुंसक और परमात्मा कहा है न कि पुरुष सृष्टा। उसने वेदों को सनातन घोषित किया है और उनके एक स्वतंत्र नियंता की ओर भी संकेत किया है।
ब्राह्मणों की इसी से भरपाई नहीं होती कि वेद व्यक्ति द्वारा निर्मित हैं। वे इससे भी आगे बढ़कर कहते हैं कि स्वयं ईश्वर उनका सृष्टा नहीं है। यह सिद्धांत इसलिए पूर्व मीमांसा के प्रणेता का है। इस सिद्धांत के पक्ष में जैमिनि के तर्क इतने विचित्र हैं कि इसकी करामात बाजीगरी का खेल लगता है।
ब्राह्मण-दर्शन के ग्रंथ पूर्व मीमांसा में यह उल्लेख है कि वेद अपौरुषेय हैं। ग्रंथ का अगला अंश इस तर्क का परिचायक है।
पूर्व मीमांसा के रचयिता जैमिनि पहले न्यायवैशेषिक के कथन की विवेचना करते हैं_ जिनका विचार है कि वेद परमेश्वर की कृति है। ये न्यायवैशेषिक के कथन का उल्लेख करते हैंः
मीमांसक का तर्क है किः
‘‘वेदों का उद्गम अमूर्त परमेश्वर द्वारा संभव नहीं जिसका तालू अथवा उच्चारण के लिए कोई अंग ही नहीं है और इस कारण यह सोचा नहीं जा सकता कि वह शब्दों की अभिव्यक्ति कर सकता है। इस आपत्ति पर नैयायिक की प्रतिक्रिया अनुकूल नहीं है क्योंकि उसके अनुसार परमेश्वर अमूर्त है फिर भी अपने भक्तों को वृतांत देने हेतु वह रूप धारण कर सकता है। इस प्रकार यह तर्क कि वेद अपौरुषेय नहीं है, अमान्य है।’’
फिर वह मीमांसकों के सिद्धांत पर आते हैंः
‘‘मैं अब इन संदेहों का निराकरण करता हूं कि इस पौरुषेयत्व का क्या अर्थ है जिसे प्रमाणित करना है। इसका तात्पर्य है, (1) किसी पुरुष द्वारा उत्पत्ति, जैसे हमारे द्वारा वेदों की उत्पत्ति, जब हम इनका दैनिक पाठ करते हैं अथवा (2) इसकी अभिव्यक्ति की दृष्टि से - क्या यह कोई व्यवस्था है - जो ज्ञान अन्य साक्ष्यों से