पांचवी पहेली: ब्राह्मणों की इस माया की क्या तुलना कि वेद न मनुष्य रचित है न भगवान की सृष्टि? - Page 40

पांचवी पहेली

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‘‘हे सोभारी, इन युवा शक्तिमान और बुद्धिमान देवों के लिए नए मंत्रों का उच्चारण कर।’’

‘‘गर्जन करने वाले वृत्रहंता इन्द्र, हम अनेक (पूजकों) ने तेरे लिए कई मंत्र रचे हैं, जो सर्वथा नवीन हैं।’’

‘‘मैं इस प्राचीन देव को सम्बोधित करूंगा। मेरी नई स्तुति, जिसकी उसे इच्छा है, उसे वह सुने।’’

‘‘हम अश्वों, पशुधन और सम्पदा की कामना से, तेरा आह्नान करते हैं।’’

इतने साक्ष्य प्रस्तुत करने पर यह सिद्ध होता है कि वेदों की रचना मनुष्य ने की है। ब्राह्मणों ने कंठशक्ति से यह प्रचारित किया क वेद मानव-रचित नहीं हैं। उसका पार पाना सरल नहीं है। यह प्रचार किस उद्देश्य से किया गया?

इसके बावजूद बहुत से ऐसे प्राख्यात दार्शनिक हैं, जो वेदों की सत्ता स्वीकार करते हैं, हालांकि वे यह नहीं मानते कि वेद सनातन अथवा अपौरुषेय हैं।

न्याय-व्यवस्था के दर्शन के संस्थापक गौतम का विचार हैः

‘‘मंत्रों की भांति वेदों की प्रामाणिक और आयुर्वेद की प्रामाणिकता ऐसे प्रवीण पुरुषों के कारण स्थापित हुई, जिन्होंने इसे प्रचारित किया। क्योंकि वेदों के प्रवीण सृष्टा विद्वान थे, सत्यनिष्ठ थे, उसी का प्रमाण है कि वेदों की रचना ऐसी प्रवृत्ति वाले व्यक्तियों द्वारा की गई और इसी कारण वेदों की प्रामाणिकता का आभास होता है। यह मंत्रों और आयुर्वेद के दृष्टांत देते हैं। मंत्र का अर्थ है ऐसा वाक्य जो विषादि का शमन करता है और आयुर्वेद वेद का अंग है, जिसमें वेद के लक्षण भी हैं उसके विषय में इस दृष्टांत से अब क्योंकि इन दो की सत्ता सामान्यतः स्वीकार्य है, इसलिए अनुमान लगाया जाना चाहिए। कुछ इस सूक्ति की व्याख्या इस प्रकार करते हैं। वही वेद हैं जिनमें प्रामाणिकता विद्यमान है अथवा मान्य हैं। ऐसे वेदत्व से किसी रचना की प्रामाणिकता का अनुमान किया जा सकता है।’’

वैशेषिक दर्शन स्वीकार करता है कि वेद प्रमाण हैं किन्तु इसका आधार निम्नांकित हैः

(1) कि वेद मेधावियों की रचना है, और

(2) इनका उद्भव दैवी है। इसलिए ये प्रमाणित हैं।

सांख्य दर्शन के संस्थापक कपिल का कथन है कि वेदों के सनातन होने का अनुमान नहीं किया जा सकता क्योंकि वेदों के अनेक पाठों में स्वयं यह संकेत है