पांचवी पहेली: ब्राह्मणों की इस माया की क्या तुलना कि वेद न मनुष्य रचित है न भगवान की सृष्टि? - Page 45

30 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

इस आपत्ति का निराकरण सूत्र 22 में किया गया है।

‘‘ध्वनि वायु का रूपांतरण नहीं है। यदि ऐसा होता तो श्रवणेंद्रिय के समक्ष कोई संगत तत्व न होता जिसकी वह अनुभूति करती है। श्रवणेंद्रिय को वायु के किसी रूपांतरण की (जिसे नैयायिकों ने युक्ति संगत बताया है) अनुभूत न होती। कान की अनुभूति अमूर्त होती है।’’

‘‘वैदिक साहित्य में उपलब्ध है कि स्वर सनातन है। इसके लिए सनातन ध्वनि

है ‘‘हे विरूप’’। अब यद्यपि इस वाक्य का एक अन्य उद्देश्य है फिर भी वह

भाषण की शाश्वतता घोषित करता है और इस प्रकार नादब्रह्म है।’’

इस सिद्धांत के पक्ष में कि वेद सनातन है और मानव द्वारा सृजित नहीं हैं ना ही परमात्मा द्वारा रचित है, जैमिनि के ऐसे तर्क हैं।

जिस तथ्य पर उनका सिद्धांत आधारित था, वह सहज है।

प्रथमतः, ईश्वर अमूर्त है और उसका तालू नहीं है, इस प्रकार वह वेदों का उच्चारण नहीं कर सकता।

दूसरे, कल्पना करें कि परमात्मा मूर्त हैं, परमात्मा उसकी अनुभूति नहीं कर सकता जो इन्द्रियों की क्षमता से परे हैं जबकि वैदिक साहित्य मानव की इन्द्रियों की अनुभूति से परे हैं।

तीसरे, शब्द और उसके अर्थ के मध्य सम्पर्क सनातन है।

चौथे, ध्वनि सनातन है।

पांचवे, क्योंकि ध्वनि सनातन है इसलिए ध्वनि से उत्पन्न शब्द भी शाश्वत है।

छठे, क्योंकि शब्द सनातन है इसलिए वे वेद भी सनातन हैं और क्योंकि वेद सनातन हैं_ इसलिए उनकस सृष्टा न मानव है और न परमेश्वर।

इन तर्कों के संबंध में क्या कहा जा सकता है? क्या इससे बढ़कर भी कुछ अनर्गल हो सकता है? कौन स्वीकार कर सकता है कि वेदों में ऐसा कुछ है जो मानव की इन्द्रियों की अनुभूतियों से परे है? कौन स्वीकार कर सकता है कि शब्द और उसके अर्थ के बीच सनातन संबंध है? कौन स्वीकार कर सकता है क नाद उत्पन्न नहीं होता ना ही प्रकट हो सकता है किन्तु सनातन है?

इन भ्रामक तर्कों के संबंध में हम पूछ सकते हैं कि ब्राह्मणों ने ऐसे निर्जीव निष्कर्षों के स्थापनार्थ ऐसा निर्जीव प्रयत्न क्यों किया? इससे वे क्या प्राप्त करना चाहते थे? क्या इसका कारण यह था कि ब्राह्मणों की चतुर्दिक सत्ता के स्थापनार्थ वेदों को चातुर्वर्ण्य का प्रतीक बना दिया गया?