छठी पहेली
वेदों की विषय-सामग्री
क्या वे कोई नैतिक अथवा आध्यात्मिक मूल्य रखते हैं?
I
यदि वेदों को अनिवार्य और उनके संशय रहित होने को स्वीकार कर भी लिया जाए तो उसके उपदेशों में नैतक और आध्यात्मिक मूल्य होने चाहिए। केवल इसलिए कि जैमिनि ने सही बताया है, हम कचरे को अनिवार्य और दोष-रहित नहीं मान सकते। वेदों में कोई नैतिक अथवा आध्यात्मिक सामग्री है भी या नहीं! प्रत्येक हिन्दू जो वेद को संशय रहित मानता है इस प्रश्न पर विचार करने को बाध्य है।
आधुनिक लेखकों के विचार इस बात को स्वीकार नहीं करते कि वेदों का कोई आध्यात्मिक मूल्य है। इस विश्लेषण के लिए हम प्रो. म्यूर के विचारों का संदर्भ ले सकते हैं। प्रो. म्यूर ख्1, के अनुसारः
‘‘इस पूरी रचना का स्वरूप और इनसे प्राप्त प्रमाणों के अनुसार जिन परिस्थितियों
में ये रचे गए, उनसे पता चलता है कि प्राचीन कवियों द्वारा गाई गई ये रचना
उन व्यक्तियों की व्यक्तिगत अभिलाषाओं और भावनाओं का सहज वर्णन मात्र है
जिन्हें उनके समक्ष दुहराया गया था। इन गीतों में आर्य ऋषियों ने अपने पैतृक
देवताओं को तरह-तरह की बलियां चढ़ाकर उनकी स्तुति की और उन्हें संतुष्ट
होने का आह्नान किया और उनसे ऐसे अनेक वरदान मांगे जिनकी मानव-मात्र को
लालसा होती है, जैसे स्वास्थ्य, सम्पदा, चिरायु, पशुधन, संतति, शत्रु पर विजय,
पाप-मुक्ति और शायद स्वर्ग-सुख भी।’’
निःसंदेह यह आपत्ति की जा सकती है कि सभी विदेशी विद्वान पूर्वाग्रह ग्रस्त हैं, इसलिए उनके मत स्वीकार नहीं किये जा सकते। हम पूर्णतः विदेशियों का सहारा नहीं लेते। इस देश में भी उनके समान विचारधारा वाले विद्वान उपलब्ध हैं। इनमें
- मयूर, संस्कृत टैक्स्ट, खंड 3, (पृष्ठ का उल्लेख नहीं है)।