छठी पहेली: वेदों की विषय-सामग्री : क्या वे कोई नैतिक अथवा आध्यात्मिक मूल्य रखते हैं? - Page 54

छठी पहेली

होता है, उसी प्रकार हमें संकटों से पार कर। I . 106 1-1 22

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  1. हे मारुत!... तुम्हारे अनुयायी तुम्हारी प्रशस्ति गा रहे हैं। प्रसन्न हो और आ

सोम पान के लिए निर्मित कुश आसन पर विराजमान हो। 7 57-1-2

  1. हे मित्र वरुण! हमने यज्ञ में तेरी आराधना की। इसे स्वीकार करने की कृपा

कर। हमें संकटों से बचा। सातवां 7.60, 12

ऋग्वेद में उल्लिखित अनेक मंत्र-समूह में से ये कुछेक हैं, किन्तु इसमें कोई संदेह नहीं कि यह छोटा-सा नमूना ही उन सबके लिए पर्याप्त है।

मैं बता दूं कि मैंने ऋग्वेद और यजुर्वेद के बहुत से अश्लील अंशों को जानकर छोड़ दिया है। जिन्हें इस संबंध में जिज्ञासा है, वे ऋग्वेद के मण्डल दस 85.37 के सूर्य-पूशान संवाद और ऋग्वेद के मंडल दस 86.6 में इन्द्र-इंद्राणी संवाद देख सकते हैं। यजुर्वेद के अश्वमेध प्रसंग में और अश्लीलता व्याप्त है।

इन अश्लीलताओं को छोड़ भी दें और ऋग्वेद के प्रार्थना वर्ग तक ही सीमित रहें तो भी क्या कोई कह सकता है कि यह प्रार्थनाएं नैतिक अथवा आध्यात्मिक उत्थान करने वाली हैं?

जहां तक दर्शन का प्रश्न है ऋग्वेद में वह नदारद है जैसा कि ‘‘प्रत्येक मंत्र किसी देवता के लिए रचा गया है जिससे ऋषि का उद्देश्य इच्छापूर्ति का है और वह उसे संबोधित करता है।’’

यदि यह प्रमाणित करने के लए इतना भी पर्याप्त नहीं है कि वेदों में कोई नैतिक अथवा आध्यात्मिक मूल्य नहीं है तो अन्य साक्ष्य प्रस्तुत किए जा सकते हैं।

जहां तक दार्शनिकता का प्रश्न है ऋग्वेद में प्रायः कुछ है ही नहीं। न ऋग्वेद नैतिकता का ही आदर्श प्रस्तुत करता है। प्रोफेसर विल्सन का कहना है कि ऋग्वेद में जो वृहद्तम है बहुत कम सैद्धांतिक अथवा दार्शनिक प्रसंग आए हैं। इसमें विभिन्न विचारधाराओं के परवर्ती अन्तर्बोध संबंधी कल्पनाओं का अभाव है। पुनर्जन्म सिद्धांत की ओर कोई संकेत नहीं है और न ही सृष्टि चक्र का कोई संदर्भ है। वेद आर्यों के सामाजिक जीवन के दिग्दर्शन का एक लाभकारी सूचना स्रोत है। यह आदिम जीवन की प्रतिच्छाया है, जिनमें जिज्ञासा अधिक है, भविष्य की कल्पना नहीं है। इनमें दुराचार अधिक, गुण मुट्ठी-भर हैं।