48 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
षष्ठ, 27 - अशुभ पक्षी समझे जाने वाले कपोत के विरुद्ध तंत्र,
षष्ठ, 29 - अशुभ समझे जाने वाले कपोत और उलूक के विरुद्ध तंत्र,
षष्ठ 64 - अशुभ पक्षी के प्रभाव से ग्रस्त व्यक्ति के प्रति अनुष्ठान,
षष्ठ, 46 - दुस्वप्नों के प्रति झाड-़फूंक,
सप्तम, 115 - दुर्गुण निवारण और सद्गुणों के लिए तंत्र,
III
इस प्रकार यह देखा जा सकता है कि अथर्ववेद मात्र जाद-टोनों, इन्द्रजाल और जड़ी-बूटियों की विद्या है। इसका चौथाई भाग जादू-टोनों और इन्द्रजान से युक्त है। किन्तु यही सच नहीं है कि केवल अथर्ववेद में ही जादू-टोनों और इन्द्रजाल की भरमार है, ऋग्वेद भी इससे अछूता नहीं है। इसमें भी काले जादू-टोनों और इन्द्रजाल संबंधी मंत्रों की भरमार है। मैं ऐसे विषयों पर कुछ सूक्त उद्धृत करता हूंः
सूक्त - 17वां (145)
देवता अथवा इस मंत्र का उद्देश्य सौत से छुटकारा पाना है। ऋषि इन्द्राणी है, अंतिम पद का छंद पंक्ति है, शेष अनुष्टुप है।
मैंने यह अतिशक्तिशाली बल्लरी प्राप्त की है, जो सपत्नी का विनाश करती है, जिसके द्वारा वह स्त्री अपने पति को पुनः प्राप्त करती है।
हे शुभ देवों द्वारा प्रेषित, शक्तिशाली (गुल्म) मेरी सौत का नाश कर और मेरे पति को केवल मेरा बना।
हे श्रेष्ठ (गुल्म) मैं भी श्रेष्ठों में श्रेष्ठ बनूं और वह जो मेरी सौत है, घृणि् ातों में घृणित बनें।
मैं उसका नाम भी नहीं लूंगी, कोई उससे प्रसन्न न हो, अन्य सौतों को दूर भगा।
मैं विजयी हूं, तू विजेता है, हम दोनों शक्तिशाली होने के कारण सौत पर विजयी होंगे।
मैं तुझे विजयी बनाती हूं। जड़ी अपने सिरहाने, मैं तुझे रखती हूं मुझे और विजयी बना। तेरा मानस मुझ से मिल जाए जैसे एक गाय अपने बछड़े से मिलती है। वह जल की भांति अबाध प्रवाहित हो।