छठी पहेली
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सूक्त चतुर्थ - (155वां)
एक और चौथे मंत्र का देवता विघ्ननाशक (अलक्ष्यविघ्न) है, 2 और 3 का ब्राह्मणस्पति, 5 का विश्वदेव, भारद्वाज पुत्र श्रिम्बित ऋषि हैं। छंद अनुष्टुप है।
दीनहीन, अभागी, कुरूप (देवी) उन शोषितों के साथ अपने पर्वत पर जा, मैं तुझे डरा कर भगाता हूं।
वह इससे डरे (संसार), दूसरे से डरे (संसार), सर्वगर्भक्षरण करने वाली, तीव्र विषाण बृहस्पति आ, कष्टों को दूर कर।
उस काष्ठ को ग्रहण कर जो गहन समुद्र में मनुष्य से दूर बहता है। अदमनीय (देवी) दूर समुद्र में जा।
असंगत स्वरों का जाप करने वाले जब सहज रूप से बढ़ते हैं, तू उन्हें भगाता है। इन्द्र के सभी शत्रुओं का नाश हो गया, वे बुलबुलों की भांति विलीन हो गए।
ये (विश्वदेव) चुराए गए पशु लौटा ला उन्होंने अग्नि जागृत की, उन्होंने देवताओं को भोजन दिया, उन्हें कौन जीत सकता है।
सूक्त 12वां (163)
क्षय रोग निवारणः ऋषि कश्यपपुख विव्रीहन है। छंद है अनुष्टुप् ।
मैं तेरा चक्षु रोग हरण करता हूं। तेरी शिरोपीड़ा, तेरी नासिका, कर्ण, ठोड़ी, मानस, जिव्हा का रोग हरण करता हूं।
तेरी ग्रीवा, तेरी नासिका, तेरी अस्थियों, तेरे संधि-क्षेत्रों, तेरे बाहु, तेरे स्कंध, तेरे बाजुओं का रोग हरता हूं।
मैं तेरी अंतडि़यों, तेरी गुदा, उदर, हृदय, गुर्दे, यकृत और अन्य अंगों का रोग मिटाता हूं।
मैं तेरी जंघाओं, घुटनों, एडि़यों, पंजों, कमर, नितंबों और गुप्तांगों का रोग हरता हूं।
मैं तेरे मूत्र-मार्ग, मूत्र-ग्रंथि, बालों, नाखूनों, समस्त शरीर का रोग नष्ट करता हूं।
मैं तेरे प्रत्येक अंग, प्रत्येक बाल, प्रत्येक जोड़, जहां भी रोग हो, उसको मिटाता हूं।