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अराजकता कैसे जायज है?

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वह ब्राह्मणों को कष् देता है- (वही, 10.129)

  1. यथा शास्त्र जीवन-निर्वाह करने वाले शूद्रों को हर महीने अपना मुंडन करवाना चाहिए, उनकी श्ुचि का विधान वैसा ही होगा जैसा वैश्यों का होता है और उनका भोजन आर्यों के भोजन का उच्छिष् अंश होगा- (वही, 5.140.)

  2. जैसा कि कहा जा चुका है, प्राचीन विधि-निर्माताओं ने जिस समाज के लिए अपनी-अपनी व्यवस्थाएं दीं, वह दो भागों में था। एक भाग उन लोगों का था जो चातुर्वर्ण्य की व्यवस्था में सम्मिलित थे। दूसरे भाग में वे लोग आते थे जो चातुर्वर्ण्य की व्यवस्था से बाहर थे। मनुस्मृति में इन्हें बाह्य अर्थात् चातुर्वर्ण्य की परिधि से बाहर कहा गया है। उन्हें निम्न जाति कहा गया है। इस निम्न जाति का उद्भव ऐसा विषय है, जिससे फिलहाल अभी में संबंधित नहीं हूं। यहां इतना ही कहना यथेष् है कि हिंदुओं के इन प्राचीन विधि-निर्माताओं के अनुसार इन निम्न जातियों की उत्पत्ति उन चारों वर्णों-ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के बीच परस्पर विवाह-संबंध होने से हुई, जो चातुर्वर्ण्य व्यवस्था में सम्मिलित किए गए। यह कहां तक सच है इस पर कभी बाद में विचार किया जाएगा। हम मुख्यतः सामाजिक संबंधों से संबंधित हैं, इनकी उत्पत्ति से नहीं। अब तक जिन विधानों की चर्चा की गई है, वह उन लोगों से संबंधित है, जो चातुर्वर्ण्य की व्यवस्था के अंतर्गत आते हैं। अब उन नियमों की चर्चा की जानी है, जो चातुर्वर्ण्य व्यवस्था के बाहर रखे गए अथवा जिन्हें निम्न जाति कहा गया। आश्चर्य यह है कि जो नियम निम्न जातियों की जीवन-चर्या नियंत्रित करते हैं, वे बहुत थोड़े हैं। ये नियम यद्यपि बहुत थोड़े हैं तो भी इन नियामकों ने उन्हें इतना संक्षिप्त कर दिया है कि किसी को नियमों की ब्यौरेवार संहिता की कोई आवश्यकता नहीं हुई। ये नियम निम्नलिखित हैंः

  3. इस पृथ्वी पर जो भी जातियां उस समुदाय से अलग रखी गई हैं, जो मुख,

बाहु, जंघा और (ब्राह्मण के) पैरों से जन्मी हैं, वे दस्यु कहलाती हैं, जो

चाहे म्लेच्छों (बर्बर जातियों) की भाषा बोलती हो या आर्यें की- (मनु,

10.45)

  1. ये जातियां प्रसिद्ध वृक्षों और श्मशान भूमि के निकट या पर्वतों पर और

झाडि़यों के पास निवास करें, (कुछ चिह्नों से) जानी जाएं और अपने

विशिष् व्यवसाय से जीविकोपार्जन करें- (वही, 10.50.)

  1. ल्ेकिन चांडालों और श्वपचों के घर के गांव के बाहर होंगे, उन्हें अपपात्र