7. अराजकता कैसे जायज है? - Page 113

98 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

दे और उसे (अपनी) समस्त संपत्ति और अपना (शरीर) सकुशल ले जाने दे- (वही, 8.380)

  1. इस पृथ्वी पर ब्राह्मण के बध से बढ़कर कोई दूसरा बड़ा पाप नहीं समझा जाता है, इसलिए राजा को अपने मन में किसी ब्राह्मण का वध करने का विचार नहीं लाना चाहिए- (वही, 8.381.)

  2. जब किसी विद्वान ब्राह्मण को प्राचीन-काल में भूमि में गड़ी कोई निधि मिल जाए तब वह उसे सारी की सारी ग्रहण कर ले क्योंकि वह प्रत्येक वस्तु का स्वामी है- (वही, 8.37.)

  3. जब राजा को भूमि में गड़ी कोई पुरानी निधि मिल जाए तब वह उसका आधा भाग ब्राह्मणों को दे दे और शेष आधा भाग अपने राजकोष में जमा कर दे- (वही, 8.38.)

जीवन-चर्या

  1. प्रत्येक शूद्र जो शुचिपूर्ण है, जो अपने से उत्कृषें का सेवक है, मृदुभाषी है, अहंकार रहित है और सदा ब्राह्मणों के आश्रित रहता है, (अगले जन्म में) उच्चतर जाति प्राप्त करता है- (वही, 9.335.)

  2. लेकिन शूद्र ब्राह्मणों की सेवा करे चाहे स्वर्ग के लिए हो या चाहे दोनों उद्देश्यों के लिए (अर्थात् इस जन्म और इससे अगले जन्म के लिए) हो, क्योंकि वह जो ब्राह्मण का सेवक कहा जाता है, अपने सभी उद्देश्यों को प्राप्त कर लेता है-(वही, 10.122.)

  3. यदि कोई शूद्र (जो ब्राह्मणों की सेवा से अपना जीवन-निर्वाह नहीं कर पाता है) जीविका चाहता है तब वह क्षत्रिय की सेवा करे या वह किसी धनी वैश्य की सेवा कर अपना जीवन-निर्वाह करे- (वही, 10.121.)

  4. उनको चाहिए कि वे उसकी योग्यता, उसके परिश्रम और यह ध्यान में रखकर कि उसे कितने आश्रितों का पालन-पोषण करना है, अपने परिवार (की संपत्ति में से) उसके लिए उचित अंश जीवन-निर्वाह के लिए नियत करे- (वही, 10.124.)

  5. खाने से बचा हुआ अन्न तथा पुराने वस्त्र, बचा हुआ अनाज और गृहस्थी का पुराना सामान उसे अवश्य दिया जाए- (वही, 10.125.)

  6. किसी भी शूद्र को संपत्ति का संग्रह नहीं करना चाहिए चाहे वह इसके लिए कितना भी समर्थ क्यों न हो, क्योंकि जो शूद्र धन का संग्रह कर लेता है,