8
विदेश के तदनुरूप उदाहरण
[I. रोम में गुलाम-प्रथा, II. इंग्लैंड में अर्ध-गुलाम,
III. यहूदी और हीनता, तथा IV. नीग्रो और गुलाम-प्रथा ]
सामाजिक असमानता केवल हिंदू समाज में ही नहीं है। यह अन्य देशों में भी रही और समाज के उच्च और निम्न, मुक्त और अमुक्त, पूजनीय और निंदनीय वर्गों में बंटने का कारण यही रही है। अन्य प्राचीन और आधुनिक देशों में अमुक्त और निंदनीय वर्गों की स्थिति और उनकी हैसियत के साथ भारत के अस्पृश्यों की स्थिति और उनकी हैसियत की तुलना करने पर बहुत-सी बातों का पता चलेगा। इनके अंतर और समानताओं को भली-भांति समझने के लिए इन एक जैसे उदाहरणों के इतिहास की संक्षिप्त जानकारी प्राप्त कर लेना, उनकी तुलना करने से पहले अत्यंत आवश्यक है। विश्व के सभी भागों में इन सभी वर्गों की स्थिति का सर्वेक्षण प्रस्तुत करना संभव नहीं। न यह आवश्यक है। केवल कुछ थोड़े से उदाहरण व्याख्या के रूप में लिए जा सकते हैं।
हिंदुओं और अस्पृश्यों के बीच परस्पर संबंध का अध्ययन करते समय हमारे मन में तीन प्रश्न एकदम उभर कर सामने आते हैं। अस्पृश्यता क्यों कर समाप्त नहीं हुई? अस्पृश्यों पर अन्याय को हिंदू वैध और न्यायपूर्ण क्यों मानते हैं? अस्पृश्यों के साथ अपने व्यवहार में हिंदू अपने विवके के संकेत का अनुभव क्या नहीं करते?
I
अस्पृश्यों जैसे निम्न और निर्दलीय वर्ग कभी अन्य समाजों में भी रहे हैं। उदाहरणार्थ, ये कभी प्राचीन रोम में होते थे। प्राचीन रोम में पांच प्रकार के निवासी थे- 1. पैट्रीशियन (कुलीन), 2. प्लेबियन (अकुलीन), 3. क्लायंट (पराधीन), 4. गुलाम और 5. फ्रीमेन (मुक्त गुलाम)।