132 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
अपने प्रति हिंदुओं के प्रेम और सद्भाव का अच्छा सबूत मिला।’’
निम्नलिखित समाचार 2 अक्तूबर, 1925 के ‘मिलाप’ से लिया गया है। पत्र का संवाददाता लिखता हैः
‘‘रुद्रप्रयाग से समाचार मिला है कि सितम्बर के पहले सप्ताह की एक
शाम को एक हरिजन रुद्रप्रयाग की धर्मशाला में आया। जब उसे पता चला
कि वहां रोजाना रात को एक बाघ आता है तो उसने धर्मशाला के प्रबंधक
से कहा कि बाघ से बचने के लिए वह उसे रात-भर के लिए धर्मशाला के
किसी कोने में पड़ा रहने दे। पर उस जालिम प्रबंधक ने एक न सुनी और ध
र्मशाला का फाटक बंद कर दिया। अभागा हरिजन धर्मशाला के बाहर कोने
में पड़ा रहा। रात-भर उसे बाघ का डर सताता रहा। जब रात ढल रही थी
तो बाघ आया और हरिजन पर टूट पड़ा। वह आदमी काफी तगड़ा था। मौत
को सामने देख वह निडर हो गया। उसने बाघ को गर्दन से पकड़ लिया और
चिल्लाया, मैंने बाघ को पकड़ रखा है। आओ और इसका काम तमाम कर
दो।’’ पर ऊंची जाति के प्रबंधक ने न तो फाटक ही खोला, और न ही किसी
अन्य तरीके से उसकी मदद की। इधर हरिजन की पकड़ ढीली पड़ गई और
बाघ जान बचाकर भाग गया। फिलहाल वह व्यक्ति श्रीनगर (गढ़वाल) के
अस्पताल में घायल अवस्था में पड़ा है, जहां उसने अपने को खुद दाखिल
करवाया। उसकी हालत नाजुक बताई जाती है।
इन उदाहरणों में व्यक्त हृदयहीनता से पता चलता है कि हिंदू को अस्पृश्यों के साथ व्यवहार करते समय उचित-अनुचित का कोई ध्यान नहीं रहता और वह उनकी बिल्कुल भी परवाह नहीं करता।
तीसरी कसौटी अस्पृश्यों की सेवा और उनके प्रति त्याग-भावना है। यहां भी हम नीग्रो लोगों का जीवन-स्तर ऊंचा उठाने के लिए अमरीकियों के प्रयासों को मानक मानकर चलते हैं। इस संबंध में कुछ आंकड़े नीचे दिए जा रहे हैं।
कृपया इस बात पर विचार कीजिए कि नीग्रो लोगों के कल्याणार्थ श्वेत लोगों ने कितना दान ख्1, दिया-
- यह तालिका ‘नीग्रो इयर बुक’ 1931-32 में पृ. 202 दी गई सूची के आधार पर तैयार की गई है।