हिंदू और सामाजिक विवेक का अभाव
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भारत में अस्पृश्यों पर कितना साहित्य छपा है? पांच-छह पैमफलैटों से ज्यादा नहीं।
छूसरी कसौटी सामाजिक व्यवहार है। मैं समाचार-पत्रों में छपी दो घटनाएं उद्धृत करना चाहता हूं। पहली घटना ‘प्रताप’ के 5 मार्च, 1926 के अंक में छपी है। यह इस प्रकार हैः
‘‘तेईस फरवरी को दिन में करीब ग्यारह बजे लखनऊ के बेगमगंज में
लगभग बारह-तेरह लोग मिट्टी खोद रहे थे। तभी एक मिट्टी का ढूह गिर
पड़ा ओर वे सभी मिट्टी में दब गए। मिट्टी हटाए जाने पर एक लड़के और
छह औरतों को निकाल लिया गया। उनमें से केवल एक औरत जिंदा बची,
जो मीरपुर की रहने वाली थी। उसे गहरी चोटें आई थी। और उसकी हालत
नाजुक थी। बेगमगंज के निवासियों ने चारपाई देने से इंकार कर दिया, जिस
पर उस औरत को लिटाया जाता। अंत में एक मुसलमान ने चारपाई दी। लेकिन
कोई हिंदू इस बात के लिए तैयार नहीं था कि उस घायल औरत को चारपाई
पर उठाकर उसके घर पहुंचा दें अंत में एक जमादार को बुलाया गया, जो
उसे उसके घर पहुंचा कर आया।’’
अस्पृश्यों के प्रति हिंदुओं की हृदयहीनता का सबसे बड़ा उदाहरण निम्नलिखित घटना से प्रकट होता है, जिसके बारे में ‘संग्राम’ के 10 जुलाई, 1946 के अंक में प्रकाशित संवाददाता की एक रिपोर्ट में बताया गया है। संवाददाता लिखता हैः
‘‘आठ जुलाई 1946 को गोवा के म्हाप्से गांव में स्थित अजिल नाम अनाथ
आश्रम में एक औरत मर गई। यह आश्रम ईसाई चलाते हैं। यह पता चला कि
वह औरत हिंदू थी। उसका कोई सगा-संबंधी नहीं था। जब यह पाया गया कि
उसका क्रियाकर्म करने वाला कोई नहीं है तो गांव के हिंदुओं ने मिलकर कफन
और अर्थी के लिए चंदा इकट्ठा किया। वे उसके शव के अनाथ आश्रम से
बाहर ले आए। उसी समय कुछ अस्पृश्य भी वहां पहुंच गए, जो मृतक औरत
को जानते थे। उन्होंने उसकी पहचान कर ली। जैसे ही हिंदुओं को पता चला
कि मरने वाली औरत अस्पृश्य थी तो वे इधर-उधर खिसक गए। अस्पृश्यों ने
हिंदुओं से कहा कि उन्होंने मृतक औरत के नाम पर जो चंदा इकट्ठा किया
है, वह उन्हें दे दें। हिंदू मुकर गए और उन्होंने कहा कि वह चंदा तो उस
औरत को हिंदू जानकर इकट्ठा किया गया था। वह हिंदू नहीं, बल्कि एक
अस्पृश्य थी, तो उसके क्रियाकर्म पर यह पैसा खर्च नहीं किया जा सकता।
अस्पृश्यों ने उसके अंतिम संस्कार का खुद ही इंतजाम किया। अस्पृश्यों को