11. हिंदू और जातिप्रथा में उसका अटूट विश्वास - Page 155

कोई ‘कोई’ कुछ भी बन सके। वे तो ऐसा समाज चाहते हैं, जिसमें वे ही कुछ हों और बाकी लोग कुछ भी न हों। अस्पृश्य ‘कुछ भी नहीं हैं लोगों का वर्ग है। इससे हिंदू ‘कुछ’ हो जाते हैं। अस्पृश्यता हिंदुओं के सहज गर्व को बनाए रखती है और उन्हें ऐसा अनुभव करने का अवसर प्रदान करती है कि वे अपने को बड़ा अनुभव करने के साथ बड़े दिखें भी। यह एक अन्य कारण है, जिससे हिंदू उन लोगों के प्रति अस्पृश्यता को नहीं त्यागना चाहते हैं, जो बहुतांश तो हैं, लेकिन वे छोटे लोग है।

अस्पृश्यता तभी दूर हो सकेगी, जब संपूर्ण हिंदू सामाजिक व्यवस्था, विशेष रूप से जातिप्रथा विलीन हो जाए। क्या यह संभव है? प्रत्येक संस्था का कोई न कोई आधार होता है। ये आधार तीन प्रकार के होते हैं, जो किसी संस्था को जीवन प्रदान किए रहते हैं। ये आधार हैं-कानूनी, सामाजिक और धार्मिक। संस्था का स्थायित्व उसके अपने आधार की शक्ति पर निर्भर करता है। जातिप्रथा के आधार की प्रकृति कैसी है? दुर्भाग्य से जातिप्रथा का आधार धार्मिक है। जातिप्रथा, वर्ग-व्यवस्था का नया संस्करण है, जिसे वेदों से आधार मिलता है। वेद हिंदू धर्म के पवित्र ग्रंथ हैं और अकाट्य हैं। मैं इसे दुर्भाग्यपूर्ण इसलिए कहता हूं कि जिस किसी का आधार धर्म होता है, वह इस कारण ही पवित्र और सनातन बन जाता है। हिंदुओं के लिए जातिप्रथा पवित्र है और सनातन है। यदि जातिप्रथा विलीन नहीं हो सकती, तब यह आशा किस प्रकार की जाए कि अस्पृश्यता विलीन हो जाएगी?

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