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हिंदू और जातिप्रथा में उसका अटूट विश्वास

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एक अन्य कारण भी है, जिससे किसी भी कानूनी या बौद्धिक तरीके से अस्पृश्यता को मिटाया नहीं जा सकता। जैसा कि पहले भी कहा जा चुका है कि हिंदू समाज-व्यवस्था सीढ़ी दर सीढ़ी असमानता के सिद्धांत पर आधारित है। यदि यह कहा जाए कि कुछ लोग ही इस सिद्धांत की इस विशिष्ता को समझते हैं, तो यह अतिशयोक्ति नहीं होगी। यदि कोई समाज सामाजिक असमानता पर आधारित है तो वह उस समाज से बिल्कुल भिन्न है, जो सीढ़ी दर सीढ़ी असमानता पर आधारित है। पहले प्रकार का समाज एक ढुलमुल व्यवस्था है, जो आत्म-सुरक्षा में सक्षम नहीं है, जब कि दूसरे प्रकार का समाज अपने अस्तित्व को बनाए रखने में पूर्णतः सक्षम है। जो सामाजिक व्यवस्था असमानता पर आधारित होती है, उसमें निचले वर्ण के लोग इस व्यवस्था का उल्लंघन करने के लिए एक-दूसरे के साथ एकजुट हो सकते हैं। उस व्यवस्था को बनाए रखने में किसी की भी रुचि नहीं होती। उस सामाजिक व्यवस्था पर सामूहिक प्रहार की संभावना नहीं होती, जो सीढ़ी दर सीढ़ी असमानता पर आधारित होती है, क्योंकि सभी पक्षों का दुख-दर्द समान नहीं होता है। यह तो तभी हो सकता है जब केवल ऊंचे और नीचे का भेदभव हो। इस सीढ़ीनुमा व्यवस्था में शीर्ष पर ब्राह्मण हैं। सर्वोच्च से नीचे उच्चतर क्षत्रिय हैं। उच्चतर से नीचे उच्च वैश्य हैं। उच्च से नीचे निम्न अर्थात् शूद्र है और निम्न से नीचे अर्थात् जो निम्नतर हैं, वे अस्पृश्य हैं। उच्चतम से सभी को गिला है और सभी उसका पतन चाहेंगे। पर नीचे वाले एकजुट नहीं हो सकते। उच्चतर वर्ग उच्चतम वर्ग से पिंड छुड़ाना चाहता है, परंतु वह उच्च निम्न और निम्नतर वर्ग के कंधे से कंधा नहीं मिला सकता कि कहीं वे उसके बराबर न हो जाएं। उच्च वर्ग को गिरा देना चाहता है जो उसके ऊपर है, परन्तु वह निम्न और निम्नतर से नहीं मिलेगा कि कहीं वे उसके बराबर का दर्जा न पा जाएं। निम्न वर्ग उच्चतम, उच्चतर और उच्च वर्ग से छुटकारा पाना चाहेगा, परंतु निम्नतर से उसकी पटरी नहीं बैठेगी कि कहीं निम्नतर निम्न का दर्जा न पा ले। सीढ़ीनुमा समाज में सिवा इसके कि जो सामाजिक पिरामिड में सबसे नीचे है, कोई भी पूरी तरह विशेषाधिकारों से वंचित नहीं है। दूसरों को श्रेणीगत विशेषाधिकार प्राप्त हैं। यहां तक कि निम्न को भी निम्नतर की तुलना में विशेषाधिकार प्राप्त हैं। चूंकि हर वर्ग को विशेषाधिकार प्राप्त हैं, अतः हर वर्ग उस व्यवस्था को बनाए रखना चाहता है।

अस्पृश्यता अस्पृश्यों के लिए दुर्भाग्यपूर्ण हो सकती है। लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि वह हिंदुओं के लिए एक वरदान है। इससे उन्हें एक ऐसा वर्ग मिलता है, जिसकी अपेक्षा वह अपने को श्रेष् समझ सकते हैं। हिंदू ऐसा समाज नहीं चाहते, जिसमें कोई भी ‘कुछ’ न हो। वे ऐसा समाज भी नहीं चाहते जिसमें हर