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प्रशासन का दृष्किण
भारतीय दंड-संहिता की धारा 2 के अनुसारः
प्रत्येक व्यक्ति जो ब्रिटिश भारत की सीमा में इस संहिता के प्रावधानों के प्रतिकूल प्रत्येक कार्य या त्रुटि के लिए दोषी होगा, वह इस संहिता के अधीन, न कि अन्यथा, दंड का भागी होगा।
जिन विधि आयुक्तों ने दंड-संहिता का मसौदा तैयार किया था, उन्होंने सेक्रेटरी आफ स्टेट को लिखे अपने पत्र से ‘प्रत्येक व्यक्ति’ शब्दों पर विशेष ध्यान दिए जाने की आवश्यकता पर बल दिया था। वे अपनी टिप्पणी में लिखते हैंः
महोदय, आप देखेंगे कि हमने इस संहिता के प्रभाव-क्षेत्र से किसी भी
स्वायत्तशासी प्राचीन रजवाड़ों को जो कंपनी की राज्य-सीमा में रहते हैं,
मुक्त रखने का प्रस्ताव नहीं किया है। यह अपवाद होना चाहिए अथवा नहीं,
यह एक ऐसा प्रश्न है, जिस पर हम तब तक कुछ नहीं कह सकते, जब
तक हमें मौजूदा संधियों के बारे में, उनकी पृष्भूमि के बारे में जिस अर्थ
में वह समझी गईं, समझौतों के इतिहास की, संबंधित परिवारों की मनोवृत्ति
और उनकी शक्ति और उन परिवारों के प्रति वहां की जनता की भावनाओं
के बारे में उससे भी अधिक सटीक जानकारी न हो जितनी कि हमें है।
अत्यंत आदरपूर्वक हम यही निवेदन करना चाहते हैं कि इस प्रकार जो भी
अपवाद होगा, वह एक बुरी बात होगी, इससे और भी बुरी बात यह है कि
जनता से यह कहा जाए कि वह कानून से ऊपर होने की स्थिति को उच्च
और विशेषाधिकार के रूप में ग्रहण करे, यह विशेषाधिकार जितने अधिक
समय तक दिए जाते रहेंगे, उतना ही इन्हें वापस लेना कठिन होता जाएगा,
इन्हें वापस लेने का इससे अच्छा अवसर कब आएगा जब सरकार एक नई
संहिता लागू करने जा रही है, जो सभी जातियों और धर्मों के लोगों पर लागू
होगी, हमें इस बात में संदेह है कि समान न्याय की अपेक्षा कोई अन्य तत्व