12. प्रशासन का दृष्टिकोण - Page 159

144 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

भी है जिसे अधिक वरीयता दी जानी चाहिए, सिवाय उस जन-आस्था के

जिसकी हमने प्रतिज्ञा कर रखी है।

शायद यह कल्पना की गई होगी कि समान न्याय का सिद्धांत स्थापित व्यवस्था को ध्वस्त कर देगा। पर सच बात तो यह है कि स्थापित व्यवस्था की बाल भी बांका नहीं हुआ और इसके बावजूद वह उसी तरह से कार्यान्वित हो रही है, जैसे वह पहले होती थी। प्रश्न किया जा सकता है कि समान न्याय का सिद्धांत अपना प्रभाव डालने में विफल क्यों रहा। इसका जवाब सीधा है। न्याय के सिद्धांत की उद्घोषणा करना एक बात है और इसे प्रभावशाली बनाना दूसरी बात है। समान न्याय का सिद्धांत कारगर होता है या नहीं, यह आवश्यक रूप से प्रशासनिक अधि कारियों के स्वभाव और आचरण पर निर्भर करता है, जिन्हें इसका पालन करना है। यदि प्रशासनिक पक्ष स्थापित व्यवस्था के प्रति उसी वर्ग का होने के कारण सहानुभूति रखकर उसका पक्ष लेगा और नई व्यवस्था के प्रति वैर-भाव रखेगा, तो नई व्यवस्था कदापि लागू नहीं हो सकती। नई व्यवस्था की सफलता के लिए प्रशासन के तदनुरूप होने की आवश्यकता कार्ल मार्क्स द्वारा 1871 में पेरिस नगर परिषद् के गठन के अवसर पर स्वीकार की गई थी और इस सिद्धांत को लेनिन ने सोवियत साम्यवाद के संविधान में लागू किया था। दुर्भाग्य से अंग्रेज सरकार ने प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों के बारे में कभी ध्यान नहीं दिया। यथार्थ तो यह है कि उसने उन्हीं लोगों के लिए प्रशासन संभालने के द्वार खोल दिए, जो हिंदुओं की स्थापित व्यवस्था में विश्वास रखते हैं, जहां समानता के लिए कोई स्थान नहीं है। इसका परिणाम यह हुआ है कि भारत में राज तो अंग्रेजों का रहा और शासन हिंदू चलाते रहे। प्रशासनिक अधिकारियों के बारे में थोड़े से ही आंकड़े इस तथ्य को उजागर कर देंगे।

भारत की राजधानी से लेकर गांवों तक पूरे प्रशासन पर हिंदू ‘कुंडली मारे बैठा है। हिंदू सर्वशक्तिमान की तरह है, जो प्रशासन की शाख पर बैठा है और कोने-कोने में हाथ फैलाए हुए है। कहीं ऐसा सूराख नहीं, जिसमें से घुसकर कोई पुरानी व्यवस्था का विरोधी गुजर सके। कोई भी विभाग हो राजस्व, पुलिस या न्याय, जहां भी देखिए, हिंदू जमे हुए हैं। यदि स्थापित व्यवस्था अब भी चली आ रही है, तो इसका कारण है कि उसे सरकार के हिंदू अधिकारियों का अटूट समर्थन प्राप्त है। हिंदू अधिकारी अपनी योग्यता के आधार पर ही शासन नहीं कर रहे हैं। वे लोगों पर उनकी जाति-कुजाति को ध्यान में रखकर प्रशासन कर रहे हैं। उनका सिद्धांत सभी के लिए एक जैसा न्याय देना नहीं है। स्थापित व्यवस्था