अलग-थलग स्थिति की समस्या
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समाज-व्यवस्था चूर-चूर हो जाएगी। लेकिन नतीजा क्या निकला? नतीजा यह है कि लोग संगठित नहीं हुए। ‘शूद्र जरायम-पेशा और आदिम जातियां ब्राह्मणों से भी अधिक अस्प्ृश्यों का विरोध करती हैं। सच तो यह है कि हिंदू समाज-व्यवस्था पर अस्पृश्यों के आक्रमण का सामना करने के लिए शूद्र वस्तुतः ब्राह्मणों के लिए पुलिस की भूमिका अदा करते हैं। यह एक अजीब-सी बात है। लेकिन यह एक हकीकत है। अगर अस्पृश्य इस स्थापित व्यवस्था के नियमों और विनियमों को तोड़ने की कोई कोशिश करते हैं तो उन पर जो अत्याचार किए जाते हैं और जिनका वर्णन पिछले अध्यायों में किया गया है, वे सबके सब शूद्रों के द्वारा किए जाते हैं।
संगठित न होने के कारणों को खोजना कठिन नहीं है। इसके कारण क्रमिक असमानता की व्यवस्था में मिल सकते हैं, जिसके अनुसार ब्राह्मण सबका सिरमौर बना हुआ है और ‘शूद्र’ ब्राह्मण के नीचे लेकिन अस्पृश्य से ऊंचे पर हैं। यदि हिंदू समाज-व्यवस्था का आधार सिर्फ असमानता होती तो वह कब की उखाड़कर फेंक दी गई होती। लेकिन वह तो क्रमिक असमानता पर टिकी है। जब शूद्र ब्राह्मण को गिराना चाहता है, तब उस समय वह इस बात के लिए तैयार नहीं होता है कि अस्पृश्य ऊपर उठकर उसकी बराबरी पर आ जाएं। शूद्र ब्राह्मणों द्वारा किए गए घोर अपमान की कड़वी घूंट पीना तो पसंद करता है, पर वह समाज-व्यवस्था को एक समान स्तर पर लाने में अस्पृश्यों का साथ नहीं देता। नतीजा यह है कि अस्पृश्यों के संघर्ष में कोई उनका साथ नहीं देता। अस्पृश्य एकदम अलग-थलग हैं। वे न केवल अलग-थलग हैं, बल्कि उन्हें उन वर्गों का विरोध सहना पड़ रहा है, जिन्हें उनका समर्थन होना चाहिए था। अस्पृश्यता को मिटाने में यह अलग-थलग की स्थिति एक और बड़ी बाधा है।