14. अलग-थलग स्थिति की समस्या - Page 173

158 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

मनु की अपेक्षा है कि अन्य सवर्णों के प्रति शूद्र को वाणी और व्यवहार से विनीत होना चाहिए।

8.270.- जो शूद्र व्यक्ति द्विज को दारुण वचन कह उसकी अवमानना

करता है, उसकी जीभ कटवा देनी चाहिए क्योंकि वह नीच कुलोद्भव है।

8.271.-यदि वह द्विज का नाम और उसकी जाति का उल्लेख अपमान

के तौर पर करता है तब उसके मुख में दस अंगुल लंबी दहकती हुई लोहे

की कील डाल दी जाए।

मनु केवल इतने से ही संतुष् नहीं है। वह चाहता है कि शूद्र जाति के लोगों के नामों तथा उपनामों से भी शूद्र की दासता व्यक्त हो। मनु कहता हैः

2.31.- ब्राह्मण के नाम का पहला भाग ऐसा हो जो शुभ हो, क्षत्रिय का

शक्ति से संबंधित, वैश्य का संपत्ति से और शूद्र का पहला नाम ऐसा हो जो

तिरस्कारणीय भाव का सूचक हो।

2.32.- ब्राह्मण के नाम का दूसरा भाग ऐसा (शब्द) हो जिसमें सुख का

भाव निहित हो, क्षत्रिय का ऐसा हो जिसमें रक्षा का भाव और वैश्य का ऐसा

हो जिसमें समृद्धि का भाव तथा शूद्र का ऐसा हो जो सेवा-कार्य का भाव

सूचित करे।

जहिर है कि ये तीनों वर्ग (द्वितीय, तृतीय और चतुर्थ) एक-दूसरे के समर्थक है। वे हिंदू समाज-व्यवस्था को मिटाने के लिए एकजुट हो सकते हैं। पर वे एकजुट नहीं हुए। ऐसा नहीं है कि उन्हें एकजुट करने के लिए कोई प्रयास नहीं किया गया है। ब्राह्मण जो हिंदू सामाजिक व्यवस्था के निर्माता है और जो इस व्यवस्था से सबसे अधिक लाभान्वित होने के कारण इसके प्रबलतम समर्थक हैं, उनके प्रभुत्व को नष् करने के लिए 1919-1935 के बीच सक्रिय गैर-ब्राह्मण पार्टी इनको एक राजनैतिक मंच पर संगठित करने की दिशा में एक प्रयास थी।

यह प्रयास इन तीनों वर्गों को संगठित करने का एकमात्र प्रयास नहीं था। एक और प्रयास मजदूर-नेता, खासकर कम्युनिस्ट नेता कर रहे हैं। उनका नारा है कि जाति चाहे जो भी हो, श्रमिक वर्ग के हित एक जैसे हैं। उनमें वर्ग-चेतना और वर्ग-एकता लाई ही जानी चाहिए। यदि वे एक बार एकजुट हो जाए तो अपनी संख्या की भयंकर शक्ति के बल पर अर्थ-व्यवस्था को भंग कर सकते हैं, और यदि एक बार अर्थ-व्यवस्था ध्वस्त हो जाती है, तो निश्चय ही हिंदू